12 बारह ज्योतिर्लिग में से चौथा ज्योतिर्लिंग मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में ओंकारेश्वर में स्थित है। भगवान शिव यहां राजा मान्धाता की तपस्या से प्रसन्न हो कर प्रकट हुए थे उसके बाद राजा मान्धाता के कहने पर वे यहां स्वयं शिवलिंग के रुप में विराजित हो गए। मान्यता है कि सावन के महीने में ज्योतिर्लिंग के नाम लेने से ही कई प्रकार के कष्ट समाप्त हो जाते हैं. राजा के नाम पर ही इस पर्वत का नाम मान्धाता पर्वत पड़ा. यह पर्वत सदैव जलमग्न रहता है. कहा जाता है कि माता नर्मदा ज्योतिर्लिंग ओंकारेश्वर का जलाभिषेक करती हैं. सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि इस ज्योतिर्लिंग का निर्माण किसी मनुष्य ने नहीं किया है बल्कि यह प्राकृतिक शिवलिंग है। यहां पर ओंकारेश्वर और ममलेश्वर की पूजा होती है. शिव पुराण में ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग को परमेश्वर लिंग कहा गया है।
मानो पिता की गोंद में खेलती हो बेटी
ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के चारों और मां नर्मदा बहती है। मां नर्मदा भगवान शिव के पसीने से प्रकट हुई उनकी पुत्री है। यहां ऐसा प्रतित होता है जैसे बेटी अपने पिता की गोद में खेलती हो और अपने पिता के निकट रहती हो। पिता और बेटी का यह अदृश्य दैविक अनुभव सिर्फ मां नर्मदा के भक्त ही कर पाते है।
मां नर्मदा से कावेरी का होता है संगम
शिवजी की जटा से निकली कावेरी नदी पौराणिक कथा के अनुसार धनपति कुबेर भगवान के परम भक्त थे. कुबेर ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की. इसके लिए उन्होंने एक शिवलिंग स्थापित किया. भगवान शिव कुबेर की भक्ति से प्रसन्न हुए और कुबेर को देवताओ का धनपति बना दिया। भगवान शिव ने कुबेर के स्नान के लिए अपनी जटा के बाल से कावेरी नदी उत्पन्न की थी. यही नदी नर्मदा में मिलती है. यहां पर कावेरी ओमकार पर्वत का चक्कर लगते हुए संगम पर वापस नर्मदा से मिलती हैं. जिसे नर्मदा और कावेरी का संगम कहा जाता है।
ओंकार का भौतिक विग्रह ओंकार क्षेत्र
जिस ओंकार शब्द का उच्चारण सर्वप्रथम सृष्टिकर्ता विधाता के मुख से हुआ, वेद का पाठ इसके उच्चारण किए बिना नहीं होता है। इस ओंकार का भौतिक विग्रह ओंकार क्षेत्र है। इसमें 68 तीर्थ हैं। यहाँ 33 कोटि देवता परिवार सहित निवास करते हैं तथा 2 ज्योतिस्वरूप लिंगों सहित 108 प्रभावशाली शिवलिंग हैं। मध्यप्रदेश में 12 ज्योतिर्लिंगों में से 2 ज्योतिर्लिंग विराजमान हैं। एक उज्जैन में महाकाल के रूप में और दूसरा ओंकारेश्वर में ओम्कारेश्वर- ममलेश्वर के रूप में विराजमान हैं।
बिना ओंकारेश्वर के पूर्ण नहीं होते तीर्थ
नर्मदा क्षेत्र में ओंकारेश्वर सर्वश्रेष्ठ तीर्थ है। शास्त्र मान्यता है कि कोई भी तीर्थयात्री देश के भले ही सारे तीर्थ कर ले किन्तु जब तक वह ओंकारेश्वर आकर किए गए तीर्थों का जल लाकर यहाँ नहीं चढ़ाता उसके सारे तीर्थ अधूरे माने जाते हैं। ओंकारेश्वर तीर्थ के साथ नर्मदाजी का भी विशेष महत्व है।
ओंकारेश्वर में स्थित है इतने मंदिर
ओंकारेश्वर तीर्थ क्षेत्र में चौबीस अवतार, माता घाट (सेलानी), सीता वाटिका, धावड़ी कुंड, मार्कण्डेय शिला, मार्कण्डेय संन्यास आश्रम, अन्नपूर्णाश्रम, विज्ञान शाला, बड़े हनुमान, खेड़ापति हनुमान, ओंकार मठ, माता आनंदमयी आश्रम, ऋणमुक्तेश्वर महादेव, गायत्री माता मंदिर, सिद्धनाथ गौरी सोमनाथ, आड़े हनुमान, माता वैष्णोदेवी मंदिर, चाँद-सूरज दरवाजे, वीरखला, विष्णु मंदिर, ब्रह्मेश्वर मंदिर, सेगाँव के गजानन महाराज का मंदिर, काशी विश्वनाथ, नरसिंह टेकरी, कुबेरेश्वर महादेव, चन्द्रमोलेश्वर महादेव के मंदिर भी दर्शनीय हैं।

शिखर के नीचे नहीं है शिवलिंग
ओंकारेश्वर लिंग किसी मनुष्य के द्वारा गढ़ा, तराशा या बनाया हुआ नहीं है, बल्कि यह प्राकृतिक शिवलिंग है। इसके चारों ओर हमेशा जल भरा रहता है। प्राय: किसी मन्दिर में लिंग की स्थापना गर्भ गृह के मध्य में की जाती है और उसके ठीक ऊपर शिखर होता है, किन्तु यह ओंकारेश्वर लिंग मन्दिर के गुम्बद के नीचे नहीं है। इसकी एक विशेषता यह भी है कि मन्दिर के ऊपरी शिखर पर भगवान महाकालेश्वर की मूर्ति लगी है। कुछ लोगों की मान्यता है कि यह पर्वत ही ओंकाररूप है। ॐ इसमें बने हुए चन्द्रबिन्दु का जो स्थान है, वही स्थान ओंकारपर्वत पर बने ओंकारेश्वर मन्दिर का है। मालूम पड़ता है।
चने की दाल चढ़ाने की है परम्परा
ओंकारेश्वर में चने की दाल चढ़ाने की परंपरा मुख्य रूप से ऋण मुक्तेश्वर महादेव मंदिर से जुड़ी है, जहाँ मान्यता है कि शिवलिंग पर चने की दाल (विशेषकर पीली) चढ़ाने से सभी प्रकार के कर्ज (ऋण) और बाधाओं से मुक्ति मिलती है, जिसे पांडवों द्वारा भी आजमाया गया था और यह भाग्य वृद्धि और आर्थिक स्थिरता के लिए भी शुभ मानी जाती है। यह ओंकारेश्वर परिक्रमा मार्ग पर नर्मदा और कावेरी के संगम के पास स्थित एक प्राचीन मंदिर है, जहाँ भक्त सोने की जगह चने की दाल चढ़ाकर मनोकामना पूर्ति का निवेदन करते हैं।


