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Narmada

मां नर्मदा के सरंक्षण में, जो प्रदेश सरकार नहीं कर पाई वह एक संस्था ने कर दिखाया!

माँ नर्मदा जिसे आज के कलयुग लोग आस्था के बावजूद लगातार गंदी करते जा रहे है। मां नर्मदा को जहां एक ओर मां की तरह पूजा जाता है वहीं दूसरी
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नर्मदा परिक्रमा में नहीं करते है सहायक नदियों के संगम स्थल पार, ऐसा है इसका कारण

मां नर्मदा परिक्रमा के दौरान नर्मदा में लगभग 41 सहायक नदियों के संगम स्थल है जहां पर आकर सहायक नदियां नर्मदा में मिलती है। जब परिक्रमा होती है तब कई
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क्यों नहीं की जाती है ? नर्मदा नदी की परिक्रमा के दौरान सहायक नदियां पार!

नर्मदा परिक्रमा के दौरान सहायक नदियों को पार करने की अनुमति नहीं रहती है। लेकिन परिक्रमा के दौरान प्रत्येक सहायक नदी को उसके उदगम स्थल तक जा कर पार करना
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बालाजी सरकार मुकेरीपुरा जहां चौथी पीढ़ी कर रही है हनुमान जी की सेवा

मुकेरीपुरा जो है तो शहर के व्यस्तम मार्ग पर स्थित है। इस जगह का नाम नए इंदौरी नहीं जानते है। शहर के व्यस्तम रोड़ पर स्थित यह क्षेत्र सांप्रदायिक तनाव
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दत्तात्रेय जयंती समारोह, संतो ने की पिपलिया लोहार स्थित खेड़ापति आश्रम में शिरकत

दत्तात्रेय जयंती के पावन अवसर पर तेजाजी नगर के निकट ग्राम पिपलिया लोहार, शिवनगर स्थित संकट मोचन हनुमान मंदिर एवं खेड़ापति आश्रम परिसर में भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
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योगमाया है माँ नर्मदा, जिनकी तपस्य़ा से टूट गई थी भगवान शिव की योग मुद्रा

आदियोगी शिव जो कि हजारों वर्षों तक योग मुद्रा में लीन रहते है। उनके ध्यान को तोड़ना किसी के बस में नहीं है। उस योगनिंदा को तोड़ने के लिए वर्षों
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सूर्य की आराधना का सबसे श्रेष्ठ ‘पौष माह’ मांगलिक कार्य होते है वर्जित

हिंदू धर्म में महिनों का भी महत्व है। जैसे श्रावण माह शिव को अत्य़ंत प्रिय होता है ऐसे ही पौष माह में सूर्य आराधना का महत्व है। वैसे इस माह
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माँ नर्मदा रहस्य! तटों पर आज भी तपस्या कर रहे है कई अदश्य साधु

नर्मदा नदी के तट पर अदश्य साधु तपस्य़ा कर रहे है। इसका कोई प्रमाण तो नहीं मिलता क्योंकि यहां पर वे सभी साधु अदश्य रूप में मौजूद है। लेकिन जो
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पृथ्वी से लगभग 500 जंतुओं की प्रजातियां होने वाली है विलुप्त!

‘प्रकृति हमसे नाराज है और पृथ्वी खतरे में’ इस लेख में मौसम केंद्र भोपाल के सेवानिवृत्त मौ.वि.अ डॉ. जी.डी. मिश्रा ने प्रकृति में होने वाले परिवर्तन पर गहन अध्ययन किया
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मां नर्मदा के तट पर चकवा-चकवी का नया बसेरा, प्रेम और विरह का प्रतीक है ये पक्षी

मां नर्मदा के ओंकारेश्वर से मोरटक्का के बीच बहती नर्मदा नदी के तट पर ठंड में अपना बसेरा बनाने वाले चकवा-चकवी जिन्हें बाह्मणी बत्ख भी कहा जाता है ने अपना