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सेवा के नाम मलाई खाने में लगा ब्लड कॉल सेंटर संचालक पांच लाख डोनर का दांवा, पांच युनिट ब्लड भी नही करा पाएं डोनेट?

इंदौर। शहर में जरूरतमंदों को ब्लड उपलब्ध कराने के दांवे करने वाला दामोदर युवा संगठन का नि:शुल्क ‘ब्लड कॉल सेंटर’ अब सवालों के घेरे में है। दांवा है कि कॉल सेंटर के पास लगभग साढ़े पांच 5 लाख ब्लड डोनर्स आन कॉल मौजूद है। जो एक कॉल पर ब्लड डोनर उपलब्ध कराते है। लेकिन इसकी हकीकत कुछ ओर सामने आ रही है। यहां कॉल करने पर किसी कॉल सेंटर पर कॉल नहीं लगता है। बल्कि ब्लड कॉल सेंटर  का संचालक ही हर बार कॉल उठाता है। जब भी कोई जरूरतमंद कॉल करता है तो ब्लड कॉल सेंटर का संचालक कहता है कि ‘मै अभी भेजता हूं’ उसके बाद पीड़ित व्यक्ति के परिजन इंतजार करते है कि कोई आएगा जो ब्लड डोनेट करेगा। लेकिन कई बार कॉल करने के बाद भी कोई ब्लड डोनेट करने नहीं आता है। ब्लड के इंतजार में जरूरतमंद परेशान हो जाता है, अंततः ब्लड के इंतजार में कई बार मरीज गंभीर अवस्था तक भी पहुंच जाता है। लेकिन ब्लड़ का पर्याप्त प्रबंध नहीं होता है।

क्यों नहीं दिया जाता डोनर का नंबर?
ब्लड कॉल सेंटर को एनजीओ के नाम पर रजिस्टर्ड करा कर उक्त संचालक शासन से मोटी रकम ले रहा है। यह रकम भी इसको कम पड़ने लगी तो इसने रेडकार्स सोसायटी से सहायता लेना शुरू कर दी। कलेक्टर ने भी उक्त संस्था की तामझाम देख कर एक मोटी रकम इस संस्था को देना शुरू कर दी लेकिन इसकी मॉनिटरिंग की कोई व्यवस्था नहीं है। जबकि उक्त व्यक्ति सेवा करने का ढिंढोरा पीटता रहता है। जबकि ब्लड कॉल सेंटर पर कॉल करने पर डोनर के नंबर नहीं दिया जाता है। ब्लड की मांग करते हुए मरीज क परिजन कई बार कॉल करते है। लेकिन उक्त व्यक्ति ने पुरा खेल अपने हाथ में ले रखा है। ब्लड कॉल सेंटर के नाम पर दो नंबर चलाए जा रहे है। यह नंबर है 9200250000 और 7024512345  पर कॉल करने पर एक नंबर तो स्वयं अशोक नायक उठाते है। दूसरे नंबर 7024512345 पर कॉल करने पर यह सुनाई देता है कि इस नंबर पर इनकमिंग सेवाएं बंद है। तो अब सवाल यह उठता है कि जब कॉल सेंटर चल ही नहीं रहा है तो रेडक्रॉस सोसायटी उसे भुगतान क्यों कर रही है।

कोई रिकॉड नहीं कैसे दी जा रही सेवाएं?
कॉल सेंटर के नाम पर उक्त संचालक अशोक नायक अपना निजी नंबर ही चला रहा है। लेकिन रेडक्राॅस सोसायटी से सहयोग के नाम पर हर माह 72 हजार रूपए की राशि वेतन देने के नाम से ले रहा है। इन 72 हजार रूपए प्रतिमाह में कॉल सेंटर कर्मचारियों को वेतन देने का रिकॉड बना कर रेडक्रास को भेज दिया जाता है। कॉल सेंटर पर वेतनभोगी लड़कियां कॉल सेंटर चला रही है तो इसकी कॉल डिटेल-रिकॉडिग भी रेडकार्स को मंगानी चाहिए कि कॉल सेंटर किस तरह से संचालित हो रहा है? रेडकार्स सोसायटी के पास सिर्फ यह रिकॉड भेजा जाता है कि इतने कॉल किए गए लेकिन यह कॉल किसे किए गए। क्यो किए गए उसका कोई रिकॉड नहीं भेजा जाता। जबकि इस तरह के कॉल सेंटर पर मात्र एक व्यक्ति ही काफी है। जो रक्त दाताओं के नाम और नंबर डेटा में जोड़ ले। साथ ही  जरूरतमंद को वह डोनर का नंबर दे दें।

रेडकार्स की कार का क्या है उपयोग?
अशोक नायक ने रेडकार्स से ब्लड डोनरो को लाने ले जाने के लिए इनोवा ली है। तो रेडकार्स इसकी मानिटरिंग क्यों नहीं करता है। कार और राशि का सदूप्रयोग हो रहा है या दुरूप्रयोग इसकी कोई मॉनिटरिंग  नहीं की जा रही है।

एक को ब्लड नहीं पहुंचा तो क्या हुआ?
जब अरविंदो हॉस्पिटल में भर्ती एक मरीज के परिजन को ब्लड ना मिलने की बात पर रिपोर्टर ने ब्लड कॉल सेंटर संचालक अशोक नायक से बात की तो इनका कहना था कि मै सेवा करता हूं यदि एक के पास ब्लड डोनर नहीं पहुंचा तो इसका मतलब यह नहीं कि किसी के पास ब्लड डोनर नहीं पहुंच रहा है। मतलब एक की जान की कोई परवाह नहीं?

इमरजेंसी में कैसे देते है सेवा?
ब्लड कॉल सेंटर के संचालक अशोक नायक ने महज 5 यूनिट ब्लड की व्यवस्था कराने में 5 दिन का समय लगा दिया तो इमरजेंसी में कैसे यह सेवा देते है ? यह जांच का विषय है। मामला तब सामने आया जब अस्पताल में भर्ती एक मरीज के पिता ने बताया कि उन्हें पांच यूनिट की मदद चाहिए थी और तमाम कोशिशों के बाद उन्हें सिर्फ एक यूनिट ब्लड उपलब्ध कराया गया. ऐसे में अब सवाल ये उठता है कि आखिर लाखों डोनर्स का डेटा किस काम का, अगर जरूरतमंद को वक्त पर ब्लड ही उपलब्ध न हो? सरकारी अनुदान के बावजूद व्यवस्था इतनी कमजोर क्यों है?

ब्लड कॉल सेंटर से किसको मिल रहा फायदा? इसकी हो जांच
ऐसे में जनता के पैसे से मिलने वाली इस सहायता के बदले व्यवस्था कितनी प्रभावी है, इसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए। ब्लड, आपातकाल में जरूरी है। ऐसे में सिर्फ ब्लड डोनर्स की पांच लाख संख्या, बड़े तामझाम लगा कर शहरवासियो को दिखाने के लिए बनाए हुए ब्लड कॉल सेंटर का क्या औचित्य है यदि डोनर समय पर उपलब्ध ही नहीं है। जब रेडकार्स सोसायटी से उक्त संचालक वेतन के नाम पर राशि ले रहा है तो सेवा की नोटंकी क्यो की जा रही ह?  ये एनजीओं कैसा जो रेडकार्स से धनराशि का सहयोग लेकर चलाया जा रहा है तो क्या सरकार पीपीपी मॉडल पर ब्लड कॉल सेंटर नहीं चला सकती है।

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