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लौकिक और पारलौकिक दुनिया का सिद्धांत, यहां देने से घटता है वहां पर भरते है भंडार

इस दुनिया में सफलता पाने के लिए अथवा परलोक संवारने के लिए अगर आप देने और लेने का सिद्धान्त समझ गए तो आपको लोक-परलोक सहित इस ब्रह्माण्ड का एक सबसे अहम सिद्धांत समझ आ जाएंगा। इस ब्रह्माण्ड में देने और लेने से उर्जा का प्रवाह होता है, यदि कोई व्यक्ति उर्जा के इस प्रवाह को रोक देता है, यानि किसी को कुछ देना तथा किसी से कुछ प्राप्त करना बन्द कर देता है, तो वह प्रकृति के सिद्धान्तों की अवहेलना कर सुखों से वंचित रहता है।

पहले देना सीखें
यदि आप कुछ प्राप्त करना चाहते हैं, तो पहले देना सीख लीजिए। यदि आप प्यार चाहते हैं, तो प्यार देना सीखिए, यदि आप भौतिक समृद्धि पाना चाहते हैं, तो दूसरों को भौतिक रूप से समृद्ध करने में उनकी मदद करें। देने और लेने का सिद्धान्त बिल्कुल सरल और स्पष्ट है, जितना आप दूसरों को देते हैं, उतना ही आपको कहीं न कहीं से प्राप्त भी होता है।

बड़े-बुजुर्ग कहते हैं कि बिना उपहार लिए किसी के घर मत जाओ। जहां कहीं भी आप जाते हैं, कुछ न कुछ देना शुरु कर दें, आपको इसका परिणाम जानकर आश्चर्य होगा, कि देने से आपका कभी कुछ कम नहीं होगा, बल्कि आप जितना किसी को कुछ देंगे, उतना ही आप कहीं न कहीं से प्राप्त भी अवश्य करेंगे।

गतिशील विनिमय पर चलता है ब्रह्माण्ड
जीवन में कभी दुःख नहीं होगा, सुख ही सुख मिलेगा, इस लोक में भी और परलोक में भी। किसी को कुछ देना अथवा किसी से कुछ प्राप्त करना, ये दोनों बातें ब्रह्माण्डीय सिद्धान्त से जुड़ी हुई हैं, जो बताता है कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड गतिशील विनिमय के सिद्धान्त पर आधारित है। प्रत्येक वस्तु जो आपको मिली है, जरूरी नहीं है कि उसे आपने अपनी मेहनत से कमाया अथवा अर्जित किया हो। अक्सर ब्रह्माण्ड द्वारा दिए गए उपहार में भी वह सौगात आपको मिल जाती है, जिसकी आपको अत्यन्त आवश्यकता हो।

जब हम अनिच्छा से किसी को कुछ देते हैं, तो इस तरह देने से उर्जा नहीं बढ़ती है, इसलिए जब भी किसी को कुछ दें तो दिल से दें ताकि आपको ब्रह्माण्ड भी दिल से आशीर्वाद दे सके। आश्चर्य बिल्कुल भी न करें कि इस दुनिया का गणित कहता है, देगा तो दीवाला निकल जाएगा लेकिन उस दुनिया का गणित कहता है, देगा तो भण्डार भर जाएगा।

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