Divinity

आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार मठ जो जगा रहे हिंदू एकता का अलख

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती
स्वामी सदानंद सरस्वती
स्वामी निश्चलानंद सरस्वती
स्वामी भारती तीर्थ जी महाराज

आदि शंकराचार्य ने भारत की चारों दिशाओं में चार प्रमुख मठों (पीठों) की स्थापना की और अपने शिष्यों को इनकी जिम्मेदारी सौंपी, जिससे शंकराचार्य परंपरा शुरू हुई। वर्तमान में धार्मिक समन्वय का कार्य करते हुए शंकराचार्य सभी मतों और पंथों में समन्वय स्थापित करने का कार्य कर रहे है। जो हिंदू धर्म को एकजुट रखने का कार्य ही इनका महत्वपूर्ण कार्य रहा है।
भारत की चार दिशाओं में चार वेदों के आधार पर चार आम्नाय पीठों की स्थापना अर्थात मठों की स्थापना की गई है। ये चारो मठ देश की धार्मिक व साँस्कृतिक सीमा को सुदृढ बनाते है। इन्हीं चार मठों में से अन्यतम उत्तराम्नाय ज्योतिर्मठ बदरिकाश्रम हिमालय में स्थित है। जिस पर वर्तमान जगद्गुरु शंकराचार्य परमाराध्य परमधर्माधीश उत्तराम्नाय ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी श्री अविमुक्तेश्वरानन्द सरस्वती’१००८’ मठ के विराजमान है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने सितंबर 2022 में अपने गुरु स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के निधन के बाद ज्योतिर्मठ का कार्यभार संभाला था।

भारत के चार शंकराचार्य
वर्तमान में भारत के चार प्रमुख पीठों के शंकराचार्य हैं। इसमें स्वामी निश्चलानंद सरस्वती (पुरी), स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती (ज्योतिर्मठ), स्वामी भारती तीर्थ और उनके उत्तराधिकारी स्वामी विधुशेखर भारती (शृंगेरी), और स्वामी सदानंद सरस्वती (द्वारका). ये सभी अलग-अलग मठों के प्रमुख हैं, जिनकी स्थापना आदि शंकराचार्य ने की थी।

चारों दिशाओं के प्रमुख पीठ
पूर्व में ओडिशा (पुरी) में गोवर्धन मठ स्थित है। जिस के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती है।
पश्चिंम में गुजरात (द्वारका) में शारदा मठ स्थित है। जिस के शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती है।
उत्तर में उत्तराखंड (बद्रीनाथ के पास) ज्योतिर्मठ है। जिसकें शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती है।
दक्षिण में कर्नाटक (चिकमंगलूर जिला) में शृंगेरी मठ स्थित है। जिस के शंकराचार्य  स्वामी भारती तीर्थ (मुख्य शंकराचार्य) और उनके उत्तराधिकारी स्वामी विधुशेखर भारती है।

हिंदुओं को एकसूत्र में बांधते शंकराचार्य
भारत के चारों मठों (ज्योतिर्मठ, शारदा मठ, गोवर्धन मठ, शृंगेरी मठ) के शंकराचार्य का मुख्य कार्य अद्वैत वेदांत दर्शन का प्रचार करना है। यह सनातन धर्म की पुनर्स्थापना, वेदों और शास्त्रों की शिक्षा, वैदिक परंपराओं का संरक्षण और आध्यात्मिक मार्गदर्शन करते है। जिसमें वे अपने मठों के माध्यम से देश भर के हिंदुओं को एकसूत्र में बांधते हैं और आध्यात्मिक शिक्षा के साथ सामाजिक कार्यों का संचालन करते हैं, जिससे सनातन धर्म की अखंडता और ज्ञान की परंपरा बनी रहे।

ऐसे कार्य करते है शंकराचार्य

अद्वैत वेदांत का प्रचार– उन्होंने ब्रह्म और जीव की एकता के अद्वैत सिद्धांत को पुनर्जीवित किया और इसे प्रमुखता दी।
सनातन धर्म की पुनर्स्थापना– विभिन्न मतों और संप्रदायों के बीच समन्वय स्थापित कर सनातन धर्म को सुदृढ़ किया और उसे एकीकृत किया।
ज्ञान का प्रसार– शास्त्रों (ब्रह्म सूत्र, उपनिषद, गीता) पर भाष्य लिखे और अद्वैत दर्शन पर कई ग्रंथ रचे।
धार्मिक अनुष्ठानों का मानकीकरण– प्रमुख देवताओं (विष्णु, शिव, शक्ति, गणेश, सूर्य, मुरुगन) की पूजा पद्धतियों को व्यवस्थित किया।
शिष्यों का मार्गदर्शन– अपने शिष्यों को मठों का प्रमुख बनाकर शिक्षा और ज्ञान की परंपरा को आगे बढ़ाया।
सामाजिक और आध्यात्मिक नेतृत्व– मठों के माध्यम से सामाजिक कार्य, औषधालय और भोजन सेवा का संचालन करते हैं, जिससे सनातन धर्म के कर्णधार के रूप में कार्य करते हैं।

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