वस्तुओं का त्याग ही पर्याप्त नहीं, उनके प्रति मोह, ममता और आसक्ति का त्याग भी जरुरी – राष्ट्रसंत सुधासागर
दलाल बाग पर चल रहे दिगम्बर जैन समाज के चातुर्मास और पर्युषण महापर्व में उत्तम त्याग धर्म पर प्रेरक आशीर्वचन
इंदौर। जिस तरह सोना भट्टी में तपकर पिघल जाता है, उसी प्रकार तपस्या से हमारे कर्मों की निर्जरा होती है लेकिन तप के बाद भी त्याग आवश्यक है। तप से अधिक कठिन त्याग होता है। केवल वस्तुओं का त्याग करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके प्रति मोह, ममता और आसक्ति का त्याग करना भी आवश्यक है। समाज में जरुरतमन्द, गरीब और असहाय लोगों की सहायता करना भी सच्चे त्याग और दान का ही स्वरूप है। जीवन को सार्थक बनाने का मार्ग यही है कि जो हेय है, उसका त्याग करो, जो उपकारी है उसका दान करो और दान के बाद ही उसका भोग करो।
ये प्रेरक और दिव्य विचार हैं संत शिरोमणि प.पू. विद्यासागर म.सा. के परम प्रभावक शिष्य और राष्ट्रसंत मुनि पुंगव प.पू. श्री सुधासागर महाराज के, जो उन्होंने सकल दिगम्बर जैन धर्म प्रभावना समिति के तत्वावधान में वीआईपी रोड स्थित किला मैदान, दलाल बाग परिसर में निर्मित विद्या-सुधा मंडप में चल रहे चातुर्मास महोत्सव में पर्युषण महापर्व की धर्मसभा में ने बुधवार को आठवें दिन उत्तम त्याग धर्म की व्याख्या के दौरान व्यक्त किए। धर्मसभा में प्रमुख रूप से चक्रवर्ती अध्यक्ष नवीन गोधा, सामाजिक संसद के अध्यक्ष आनंद गोधा, मनीष गोधा एवं शिविर के पुण्यार्जक आकाश जैन कोयला परिवार आदि ने देशभर से आए 10 हजार से अधिक शिविरार्थियों की आत्मीय अगवानी की।
जब समूचा सभा मंडप भाव बिभोर हो उठा- सभा का शुभारंभ मंगलाचरण एवं पाद प्रक्षालन के साथ हुआ। समूचा सभा मंडप उस समय भाव विभोर हो उठा जब राष्ट्र संत प.पू. सुधासागर म.सा. ने उपस्थित सभी श्रावकों को आशीर्वाद के रूप में गंधोदक प्रदान किया, वहीं चक्रवर्ती अध्यक्ष नवीन गोधा ने भी मुनिश्री सुधासागर म.सा. को गंधोदक भेंट कर अपनी श्रद्धा एवं विनय प्रकट की। इस अवसर पर महोत्सव अध्यक्ष अशोक डोसी, महामंत्री हर्ष जैन, संजय सामरिया, धर्मेन्द्र जैन, गिरीश जैन, अक्षय कासलीवाल, प्रिंसपाल टोंग्या, संजय पाटोदी, हुकमचंद जैन काका, प्रदीप ब्रह्मचारी, विनोद भैया, विजय दुर्रा, सौरभ बडजात्या, राहुल सेठी, राजेश गंगवाल, भूपेंद्र भोपाली एवं अर्चना गोधा सहित अनेक सहयोगी बंधुओं ने विभिन्न व्यवस्थाओं में सहयोग प्रदान किया। दलाल बाग पर प्रतिदिन सुबह 9 से 10.30 बजे तक राष्ट्रसंत के प्रवचनों की अमृत वर्षा का क्रम जारी है। यहाँ चल रहे श्रावक संस्कार शिविर और दस लक्षण महापर्ण में देश-विदेश से आए हजारों समाज बंधु पूरे उत्साह के साथ अपनी तप साधना में जुटे हुए हैं।
राष्ट्रसंत ने उत्तम त्याग धर्म की व्याख्या करते हुए कहा कि केवल वस्तुओं का त्याग करना ही पर्याप्त नहीं है। संयोग, सम्बन्ध को छोड़ने के लिए इच्छाओं का त्याग आवश्यक है जबकि अंतरंग संस्लेष सम्बन्ध को तोड़ने के लिए तप, साधना, भेद-विज्ञान और पूर्ण त्याग जरुरी है। गृहस्थों को प्रेरणा देते हुए मुनिश्री ने कहा कि जीवन में जो वस्तु हमें उपकारी लगे उसका पहले दान करो और उसके बाद स्वयं उसका उपयोग करो। हमारे पूज्य साधु संतों ने जिन उपकारी वस्तुओं का भी त्याग कर दिया है, उनके लिए आहार, औषधि आदि का दान करना चाहिए। वस्तुओं के प्रति मोह, ममता और आसक्ति का त्याग करना भी आवश्यक है।
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