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सिद्ध श्रीचक्र साधना महोत्सव जैसे अनुष्ठान भारतीय गौरवशाली परम्परा को आगे बढ़ाने में मील के पत्थर की तरह–शंकराचार्यजी

सिद्ध श्रीचक्र साधना महोत्सव जैसे अनुष्ठान भारतीय गौरवशाली परम्परा को आगे बढ़ाने में मील के पत्थर की तरह–शंकराचार्यजी

एयरपोर्ट रोड स्थित नरसिंह वाटिका में पुरुषोत्तम मास के उपलक्ष्य में आचार्य ब्रह्मचारी प्रशांत के निर्देशन में हुआ अनूठा अनुष्ठान

इंदौर। हमारी संगठन शक्ति, परम्पराएं और पौराणिक वैभव ही सनातन समाज के आधार स्तम्भ हैं। वर्तमान में अनेक विसंगतियां और विकृतियाँ पनपने लगी हैं। हमारी आने वाली पीढ़ी को सँभालने के लिए उन्हें धर्म, संस्कृति और परम्पराओं का ज्ञान देना बहुत जरुरी है। सिद्ध श्रीचक्र साधना महोत्सव जैसे अनुष्ठान भारतीय गौरवशाली सनातन परम्परा को आगे बढ़ाने में मील के पत्थर की तरह काम करेंगे। इस तरह के आयोजन निरंतर होते रहना चाहिए ताकि नई और पुरानी पीढ़ी के बीच समन्वय एवं संतुलन बना रहे।
ये प्रेरक आशीर्वचन हैं जगदगुरु शंकराचार्य भानपुरा पीठाधीश्वर स्वामी ज्ञानानंद तीर्थ के, जो उन्होंने एयरपोर्ट रोड स्थित नरसिंह वाटिका पर पुरुषोत्तम मास के उपलक्ष्य में गुप्त काशी-केदारखंड के ब्रह्मचारी आचार्य प्रशांत के निर्देशन में आयोजित सिद्ध श्रीचक्र साधना महोत्सव में शामिल साधकों को आशीर्वचन देते हुए व्यक्त किए। अनुष्ठान में पंचायती अखाडा श्री निरंजनी हरिद्वार के महामंडलेश्वर स्वामी जयगिरि महाराज सहित अनेक प्रमुख तपोनिष्ठ संत विद्वानों ने भी अपना सानिध्य प्रदान किया। सांसद शंकर लालवानी सहित अनेक राजनेता भी इस अनुष्ठान के साक्षी बने। स्वामी जयगिरि महाराज ने भी कहा कि पुरुषोत्तम मास में सिद्ध श्रीचक्र साधना में शामिल साधक भाग्यशाली हैं जिन्होंने सनातन धर्म के पोषण के साथ स्वयं के कल्याण के लिए भी यह दिव्य अनुष्ठान विद्वान आचार्यों के निर्देशन में सम्पादित किया है।
प्रारम्भ में शंकराचार्यजी एवं अन्य संतों के सानिध्य में गोमुख से लाए गए पवित्र गंगा जल एवं पंचगव्य से शुद्धिकरण के पश्चात ब्रह्मचारी प्रशांत और उनके सहयोगी विद्वानों ने विद्याधाम के संस्थापक महामंडलेश्वर स्वामी गिरिजानंद सरस्वती ‘भगवन’ द्वारा बताई गई श्रीविद्या पद्धति से सिद्ध श्रीचक्र की विधिपूर्वक स्थापना कराई तथा गुरु पूजा, गणपति पूजा, कलश स्थापना के बाद श्रीसूक्त, देवीसूक्त, ललिता सहस्त्रनाम मन्त्रों से सामूहिक जाप शुरू किया। अनुष्ठान में माँ जगदम्बा का विशेष अर्चन किया गया, जिसमें अश्वगंधा, ब्राह्मी, हल्दी, कुमकुम, चन्दन, तुलसी, कमलगट्टा, शतावरी, इत्र, केसर, ब्रह्मकमल जैसी अनेक पवित्र सामग्री का प्रयोग किया गया। पुरुष साधक श्वेत एवं महिला साधक पीताम्बर एवं लाल परिधान में आए थे। अनुष्ठान में हुए सामूहिक मंत्रोच्चार से समूची नरसिंह वाटिका एवं आसपास का क्षेत्र मंगल ध्वनि से गुंजायमान होता रहा। वाटिका पर माँ ललिता त्रिपुर सुंदरी भगवती का भव्य दरबार एवं स्वामी गिरिजानंद सरस्वती भगवन का आदमकद चित्र भी आकर्षण के केंद्र बने रहे।
सभी साधकों को पूजन सामग्री उनके स्थान पर पहले ही उपलब्ध करा दी गई थी। आचार्य प्रशांत के साथ 11 विद्वान ब्राह्मणों एवं 11 वेदपाठी बटुकों ने भी अनुष्ठान में सहयोग एवं साधकों का मार्गदर्शन किया। मंच पर शंकराचार्यजी के साथ पंचायती अखाडा श्री निरंजनी हरिद्वार के महामंडलेश्वर सहित शहर के भी अनेक संत विद्वान उपस्थित थे जिन्होंने सम्पूर्ण साधना के दौरान साधकों के कल्याण के लिए प्रार्थना की। पूजन-अर्चन के पश्चात महाआरती में एक हजार से अधिक श्रद्धालु शामिल हुए। अतिथि संतों द्वारा लंबे अरसे बाद शहर में हुए इस अनुष्ठान को पुरुषोत्तम मास का सबसे महत्वपूर्ण एवं शास्त्रोक्त आयोजन बताया गया।
साधकों को श्रीयंत्र एवं रुद्राक्ष भेंट – अनुष्ठान में शामिल होने वाले साधकों को गंगा के उदगम स्थल गोमुख से अभिमंत्रित और बद्रीनाथ धाम से सिद्ध किए गए गोमती चक्र, केदारनाथ के चरणों से स्पर्श कराए गए पवित्र रुद्राक्ष सहित अभिमंत्रित श्रीयंत्र भी घर ले जाकर स्थापित करने के लिए भेंट किए गए। साधकों को श्री अर्थात सम्पन्नता और समृद्धि की प्राप्ति तथा विश्व शांति एवं जनकल्याण के उद्देश्य से आयोजित इस महोत्सव में दूर-दूर से आए साधकों ने उत्साहपूर्वक अपनी भागीदारी की। अनेक साधक सीधे नरसिंह वाटिका पहुंचे जिन्हें उदारतापूर्वक इस अनुष्ठान में शामिल किया गया ताकि कोई भी श्रद्धालु पुरुषोत्तम मास में वंचित न रह पाए।

 

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