धर्म समाज को चैतन्यता और निर्भयता प्रदान करता है : जगदगुरु
गीता भवन में चल रहे भागवत ज्ञान यज्ञ में धूमधाम से मना रुक्मणी विवाह का उत्सव – आज सुदामा चरित्र एवं व्यास पूजा
इंदौर। हमारी सनातनी संस्कृति परम्पराओं और मर्यादाओं पर केन्द्रित है। वर्तमान युग धर्म जागरण का है। धर्म प्रदर्शन के लिए नहीं, दर्शन के लिए होता है। धर्म समाज को चैतन्यता और निर्भयता प्रदान करता है। दुनिया को हमारा धन चाहिए लेकिन भगवान को केवल हमारा मन चाहिए। यदि हम अपने मन को फूल की तरह तरोताजा, सुगन्धित और सुंदर बनाकर भगवान को समर्पित करें तो निश्चित ही भगवान प्रसन्न हुए बिना नहीं रहेंगे। रुक्मणी विवाह नारी के आत्मसम्मान की रक्षा और उसके मंगल का सूचक है।
ये दिव्य विचार हैं वृन्दावन के जगदगुरु श्री गोपेश्वर चैतन्य महाराज के, जो उन्होंने शुक्रवार को मनोरमागंज स्थित गीता भवन पर मारवाड़ी माहेश्वरी प्रगति मंडल की मेजबानी में चल रहे भागवत ज्ञान यज्ञ में महारास एवं श्रीकृष्ण-रुक्मणी विवाह प्रसंगों की व्याख्या के दौरान व्यक्त किए। कथा में रुक्मणी विवाह का उत्सव पूरे उत्साह और उमंग के साथ मनाया गया। प्रारम्भ में मंडल के अध्यक्ष रामकिशोर राठी एवं मंत्री मनोज धूत के साथ श्याम सुंदर-विमला मूंदड़ा, रामप्रसाद-उर्मिला चांडक, रामकिशन-मंजू कोठारी आदि ने व्यास पीठ का पूजन किया। उत्सव में रामाजुन पलोड़, श्रीकांत तोषनीवाल, सुमित मेनानी, रामनिवास राठी, भरत डागा, मनमोहन मूंदड़ा, महेंद्र डागा एवं उज्जवल चांडक ने विवाह में आए मेहमानों की अगवानी की, वहीं अंजू राठी, चंदा धूत, प्रीति बंग, सुनीता लाहोटी, संगीता पलोड़, सपना सोनी एवं प्रीति चांडक ने दुल्हन की सखियों के रूप में सौलह श्रृंगार में सज-धजकर विवाह के पूर्व नृत्य की शानदार प्रस्तुति देकर भक्तों का मन मोह लिया। मनोहारी भजन संकीर्तन के बीच विवाह की रस्म सम्पन्न हुई। कृष्ण रुक्मणी ने जैसे ही एकदूजे को वरमाला पहनाई समूचा सत्संग सभागृह राधा कृष्ण के जयघोष से गूंज उठा। अध्यक्ष रामकिशोर राठी ने बताया कि शनिवार को दोपहर 3 से शाम 7 बजे तक सुदामा चरित्र एवं व्यास पूजा के पश्चात अगले दिन रविवार को सुबह 9 बजे यज्ञ-हवन एवं पूजन के साथ कथा का विराम होगा।
विद्वान वक्ता ने विभिन्न प्रसंगों की व्याख्या के दौरान कहा कि दुनिया स्वार्थी है लेकिन हमारे कृष्ण सारथी हैं जो जीवन की अंतिम यात्रा तक हमारी गाड़ी को चलाते हैं। दुनिया का स्वार्थ हमें अंदर से बिगाड़ देता है लेकिन भक्ति का स्वार्थ हमारे अंतर्मन को निर्मल और पवित्र बना देता है। भगवान की बाल लीलाओं में भी अनेक सन्देश दिए गए हैं। प्रकृति के साथ खिलवाड़ के नतीजे हमें ही नहीं, आने वाली पीढ़ियों को भी भोगना पड सकते हैं। रुक्मणी विवाह नारी के प्रति भगवान की करुणा, कृपा और मंगल भाव का प्रतीक है। भारतीय संस्कृति में विवाह कोई सौदा नहीं, संस्कार माना गया है। हमारा समाज संस्कारों और मर्यादाओं पर ही टिका हुआ है।


