प्रकृति ही दुनिया का सबसे बड़ा धर्म, इसकी नाराजी का समाधान अगल-बगल नहीं अंदर झांककर खोजना होगा–पद्मभूषण डॉ. जोशी
संस्था सेवा सुरभि द्वारा आयोजित “क्यों रूठे हुए हैं मेघराज मालवांचल से” विषय पर हुई दिलचस्प चर्चा में शामिल हुए शहर के पर्यावरणविद और प्रबुद्धजन

इंदौर। दुनिया में सबसे बड़ा धर्म प्रकृति है। ऐसा कोई समाज और धर्म नहीं, जिसका प्रकृति से कोई वास्ता नहीं हो। प्रत्येक व्यक्ति को चाहे वह किसी भी धर्म और समाज का हो, हवा, पानी, मिटटी, जंगल और प्रकृति का साथ चाहिए। सबसे बड़ा धर्म प्रकृति ही होना चाहिए लेकिन दुनिया के अनेक देशों ने अपने-अपने ढंग से प्रकृति की परिभाषाएँ बना ली है। 70 हजार वर्ष का इतिहास देखें तो पता चलेगा कि हमने प्रकृति का एक तरह से अपने पेट और व्यवसाय के लिए इस कदर शोषण और दोहन किया है कि जंगल, जानवर और जीव तक को संख्या के मान से आधा कर दिया। हमने घरों में कुत्ते-बिल्ली पालना शुरू कर दिए। हमें आज भी पता नहीं है कि हम किस मौसम में जी रहे हैं। फरवरी गर्म हो गई है और हिमाचल प्रदेश में भी मई-जून में मौसम का मिजाज बदल गया है। इसके लिए हम स्वयं जिम्मेदार हैं। यदि प्रकृति की नाराजी का समाधान खोजना है तो अगल-बगल नहीं, अपने अंदर ही झांककर खोजना होगा। विकास और समृद्धि के नाम पर हमने हवा, मिटटी, जंगल, पानी के साथ खिलवाड़ कर प्रकृति को नाराज कर दिया है।
देश के प्रमुख प्रख्यात पर्यावरणविद, हरित कार्यकर्ता और हिमालयन पर्यावरण अध्ययन और संरक्षण संगठन (HESCO) के संस्थापक पद्मभूषण डॉ. अनिल प्रकाश जोशी ने शुक्रवार को साउथ तुकोगंज स्थित होटल कलिंगा के सभागृह में संस्था सेवा सुरभि के तत्वावधान में “क्यों रूठे हुए हैं मेघराज मालवांचल से” विषय पर आयोजित चिंतन और मंथन के दौरान उक्त बातें कही। प्रारम्भ में संस्था सेवा सुरभि की ओर से ओमप्रकाश नरेडा, मोहन अग्रवाल, डॉ. दिलीप वाघेला, किशोर पंवार और प्रेस क्लब की ओर से मुकेश तिवारी ने डॉ. जोशी का स्वागत किया। चर्चा में सांसद शंकर लालवानी, शहर काजी डॉ. इसरत अली, उद्योगपति वीरेन्द्र गोयल, भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय की सलाहकार समिति के सदस्य डॉ. भारत शर्मा भी अतिथि के रूप में शामिल हुए। डॉ. जोशी के उद्बोधन के साथ ही सभागृह में उपस्थित शहर के प्रबुद्ध और गणमान्य नागरिकों ने अनेक प्रश्न भी पूछे और प्रकृति से लेकर मौसम की बेरुखी के बारे में अनेक जानकारियां भी प्राप्त की। इस अवसर पर पर्यावरणविद ओपी जोशी, अतुल शेठ, कुमार सिद्धार्थ, पद्मश्री जनक पलटा, केट के पूर्व वैज्ञानिक निकेतन सेठी, वरिष्ठ अभिभाषक अनिल त्रिवेदी, डॉ. किशोर पंवार, डॉ. भोलेश्वर दुबे, डॉ. दिलीप वाघेला, पंकज कासलीवाल, कमल कलवानी सहित शहर के अनेक संगठनों के प्रतिनिधि भी शामिल हुए। संचालन अतुल शेठ ने किया और आभार माना अनिल त्रिवेदी ने।
अपने उद्बोधन में डॉ. जोशी ने कहा कि व्यक्ति और गाँव भले ही अलग-अलग हो सकते हैं लेकिन प्रकृति एक ही है। दुनिया में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं जिसे प्रकृति की जरूरत न हो। हर व्यक्ति को जल, वायु, जमीन, जंगल की जरूरत पड़ती ही है लेकिन प्रकृति के प्रति हमने अपनी जिम्मेदारियों को शायद सही ढंग से नहीं निभाया है। खेतीबाड़ी से शुरू हुई मानव की यात्रा अब जंगल से लेकर जानवर काटने तक पहुँच गई है। जानवरों को भी हमें नहीं बख्शा। घरों में पालतू कुत्तों की संख्या भले ही चार मिलियन हो गई हो लेकिन अन्य जानवर घट रहे हैं। आज हमें पता ही नहीं कि हम किस मौसम में जी रहे हैं। मौसम के आगमन की हमें कोई भनक तक नहीं मिलती। हमने सब बिखेर दिया है। इसके लिए हम स्वयं ही जिम्मेदार हैं। विकास और समृद्धि के नाम पर हम जो दौड़ लगा रहे हैं, चाहे वह किसी भी सरकार और किसी भी देश में हो वह बिना सोची समझी दौड़ है। उद्योगों के नाम पर हमने अनेक अवसरों पर प्रकृति से खिलवाड़ किया है। पानी खत्म हुआ तो बोतलबन्द पानी का बिज़नेस बढ़ गया। हवा खराबी के नाम पर प्यूरीफाई चल गए। आज आईआईटी में शिक्षा के नाम पर हम क्या पढ़ा रहे हैं। रिसर्च केवल टेक्नोलॉजी तक ही सीमित रह गई है। जिस दिन हमारे हाथ से जल, जंगल, मिटटी और पानी चले जाएँगे उस दिन क्या होगा।
उन्होंने कहा कि इंदौर से मेरा पुराना रिश्ता है। जब यहाँ का न्योता मिला तो मैंने यही कहा कि यहाँ के लोगों से मिले बिना बात नहीं बनेगी। हमें सोचना होगा कि प्रकृति का जो सिस्टम बना हुआ था हजारो-लाखो सालों से वह अब फिर से पटरी पर कैसे आएगा। पहाड़ और नदियों से लेकर केचमेंट एरिया और भूमिगत जल को लेकर हमें सोचना होगा। हमने अब तक प्रकृति की प्रवृत्ति और विज्ञान को नहीं समझा है। चिंतन करें कि पहले पानी आया या पेड़ आया। मुझे नहीं पता कि भारत विश्व गुरु बनेगा या नहीं लेकिन यदि हमने प्रकृति पर काम किया और हमारे सभी प्रयोग सही रहे तो निश्चित ही हम प्रकृति को मनाने में कामयाब हो सकेंगे। प्रकृति को मनाने के लिए हमें उसका महत्व समझना पड़ेगा। केवल प्रार्थना करने से ही काम नहीं चलेगा। प्रकृति से अब तक हमने जो लिया है वापस लौटाने का काम भी करना पड़ेगा।


