Narmada

मां नर्मदा के कम होते वन क्षेत्र पर सेवानिवृत्त मौसम वैज्ञानिक का चिंतन

भोपाल मौसम विभाग के सेवानिवृत्त मौ.वि.अ. मौ.के. डॉ.जी.डी मिश्रा ने अपने एक लेख में नर्मदा के किनारे तेजी से घट रहे वनक्षेत्र पर लिखा है कि वनक्षेत्र कम होने से किस तरह नर्मदा नदी के जलस्तर को कितना नुकसान पहुंचेगा-

“मैं नर्मदा हूं। जब गंगा नहीं थी, तब भी मैं थी। जब हिमालय नहीं था, तब भी मैं थी। मेरे किनारों पर नगर सभ्यता का विकास नहीं हुआ। मेरे दोनों किनारों पर तो दंडकारण्य के घने जंगलों की भरमार थी। इसी के कारण आर्य मुझ तक नहीं पहुंच सके। मैं अनेकों वर्षों तक आर्यावर्त की सीमा रेखा बनी रही। उन दिनों मेरे तट पर उत्तरापथ समाप्त होता था और दक्षिणापथ शुरू होता था।

मेरे तट पर मोहनजोदड़ो जैसी नगर संस्कृति नहीं रही, लेकिन एक अरण्यक संस्कृति अवश्य रही। मेरे तटवर्ती वनों मे मार्कंडेय, कपिल, भृगु, जमदग्नि, च्यवन आदि अनेकों ऋषियों के आश्रम रहे। यहाँ की यज्ञवेदियों का धुआँ आकाश में मंडराता था। ऋषियों का कहना था कि तपस्या तो बस नर्मदा तट पर ही करनी चाहिए। सिद्धी तो बस वहीं मिलती है।
इन्हीं ऋषियों में से एक ऋषि ने मेरा नाम रखा —रेवा।

रेव् यानी कूदना। उन्होंने मुझे चट्टानों में कूदते फांदते देखा तो मेरा नाम रख दिया रेवा। एक और अन्य ऋषि ने मेरा नाम नर्मदा रखा। नर्म यानि आनंद,दा यानि देने वाली। आनंद देनेवाली नदी।

जबलपुर में नर्मदा नदी
मैं भारतवर्ष की सात प्रमुख नदियों में से एक हूं ।(गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती) गंगा के बाद मेरा ही महत्व है। पुराणों में जितना मुझ पर लिखा गया है उतना और किसी अन्य नदी पर नहीं। स्कंदपुराण का रेवाखंड तो पूरा का पूरा मुझको ही अर्पित है। पुराण कहते हैं कि जो पुण्य , गंगा में स्नान करने से मिलता है, वह पुण्य तो मेरे दर्शन मात्र से ही मिल जाता है।

मेरा जन्म अमरकंटक में हुआ। मैं पश्चिम की ओर बहती हूं। मेरे प्रवाह का आधार चट्टानी भूमि है। मेरे तट पर आदिम जातियां निवास करती हैं। जीवन में मैंने सदा कड़ा संघर्ष किया। मैं एक हूं,पर मेरे रुप अनेक हैं। मैं मूसलाधार वृष्टि पर उफन पड़ती हूं,तो गर्मियों में बस मेरी सांस भर चलती रहती है।

मैं प्रपात बहुल्या नदी हूं। कपिलधारा,दूधधारा,धावड़ीकुंड,सहस्त्रधारा मेरे मुख्य जल प्रपात हैं ।
ओंकारेश्वर मेरे तट का प्रमुख तीर्थ है । महेश्वर ही प्राचीन माहिष्मती है। वहाँ के घाट देश के सर्वोत्तम घाटों में से है। मैं स्वयं को भरूच (भृगुकच्छ) में रत्न सागर जिसे वर्तमान में अरब सागर के नाम से जाना जाता है, को समर्पित करती हूँ ‌।
मुझे याद आया । अमरकंटक में मैंने कैसी मामूली सी शुरुआत की थी । यह तय करना कठिन है कि कहां मेरा अंत है और कहां समुद्र का आरंभ? परन्तु आज मेरा स्वरुप बदल रहा है । मेरे तटवर्ती प्रदेश बदल गए हैं,मुझ पर कई बांध बांधे जा रहे हैं। मेरे लिए यह कष्टप्रद तो है,पर जब अकालग्रस्त, भूखे-प्यासे लोगों को पानी,चारे के लिए तड़पते पशुओं को, बंजर पड़े खेतों को देखती हूं, तो मन रो पड़ता है। आखिर में मैं माँ जो हूं।

मुझ पर बने सारे बांध इनकी आवश्यकताओं को पूरा करेंगें। अब धरती की प्यास बुझेगी। मैं धरती को सुजला सुफला बनाऊंगी। यह कार्य मुझे एक आंतरिक संतोष देता है और मैं अपनी राह पर निरंतर चल रही हूं।

सरदार सरोवर बाँध
अध्यात्म व चेतना की असीम ऊंचाइयों और नदी को केवल पानी मानने के जड़ चिंतन की नुकसानदेह खाई के बीच कुछ भी होने या कहलाने से पहले नर्मदा एक नदी है, और नदी की पहली भौतिक पहचान है प्रवाह। यानी जीवन प्रवाह, यानी नदी के त्रिआयामी भौतिक स्वरूप का चौथा अदृश्य पर सबसे महत्वपूर्ण आयाम। जल में और सब कुछ होते हुए भी यदि प्रवाह नहीं रहा तो वह और कुछ भी हो नदी नहीं कहला सकती। अतः किसी  नदी को बचाए रखना हो तो उसके प्रवाह को जीवित और स्वस्थ रखना ही होगा।

अतः प्रवाह को खो देने में नदी को भी खो देने का खतरा है और नदी के साथ साथ ही आस्था, अर्थव्यवस्था और संस्कृति पर भी गंभीर खतरे आने का डर है। खेद और चिंता की बात यह है कि विकास की जल्दबाजी में हम सभी अभी नहीं देख पा रहे कि इस चौथे आयाम के साथ साथ हम अपनी नदियों को ही समाप्त करते जा रहे हैं। जंगल, नदियों के इस चौथे आयाम यानी प्रवाह को स्थिरता प्रदान करके उन्हें सरल,अविरल और निर्मल बनाए रखने का काम बिना किसी प्रदर्शन के निरंतर करते चले आ रहे हैं। विंध्य और सतपुड़ा पर्वत श्रेणियों के जंगल नर्मदा के प्रवाह को सत्यम-शिवम-सुंदरम बनाए रखने का जो चमत्कार करते हैं वही नर्मदा के भौतिक स्वरूप में जान डालता है। यदि नर्मदा मध्य भारत को जिंदा रखने वाला जादू है तो इस जादू की जान जंगलों में ही है इसी सत्य को स्पष्ट है कि नर्मदा के प्राण वन है।

हर जंगल एक बीज से बना और हर नदी का पटल एक बूंद से प्रारंभ होता है,बीज से जंगल बनने की यात्रा आकाश की ओर तथा बूंद से नदी बनने की यात्रा पटल की ओर चलती है। विपरीत दिशा में निरंतर चल रही हिंदू यात्राओं के बीच जीवन के सृजन से लेकर विसर्जन तक सभी कुछ सिमट जाता है। बीज और बूंद इन दोनों यात्राओं में गहरा संबंध है। यही संबंध जंगल को नदियों का मायका बनाता है, मायका जितना समृद्ध हो नदियां उतनी ही सदा निरा और समाज उतना ही सुकून से रहता है। मायके में हालात बिगड़े तो नदियां बेहाल और समाज बेचैन होने लगता है।

समाज- जंगल-नदियों के इसी गुण रहस्य को वैज्ञानिक नज़रिये से देखने के साथ-साथ विकास की नीतियों और कार्यक्रम में समावेश करने की बहुत बड़ी आवश्यकता है। हम नर्मदा की बात करते हैं, नर्मदा को मेकलसुता भी कहते हैं,मेकलपर्वत श्रेणी में बसे अमरकंटक से निकलकर गांव-जंगलों से गुजरती नर्मदा नदी का प्रवाह वनों से जुड़ा है। नर्मदा पुराण से पता चलता है कि नर्मदा का जंगलों से नाता युगों पुराना है, नर्मदा की अनेक सहायक नदियां बनवासी जंगलों से आती है जिसकी हरियाली केवल सुंदरता की दृष्टि से नहीं बल्कि नदी लहरों में जलधारा को बारहमासी और सदानीरा बनाए रखने के लिए जरूरी है। यह वैज्ञानिक तथ्य हैकि जंगल बारिश के मौसम में बादलों से वर्षा को खींचते हैं और उसे सोखकर धीरे-धीरे रिसते हुए अपनी जड़ों से साल भर छोड़ते हैं। इसी कारण घने जंगलों में नदियां साल भर पानी से लबालब भरी रहती है। जंगलों- नदियों के इसी वैज्ञानिक राज को सरल भाषा में समझना बहुत जरूरी है। नर्मदा या ऐसी ही किसी भी दूसरी नदी के लिए जंगल अत्यंत महत्वपूर्ण है। सामान्य बोलचाल की भाषा में यदि कहा जाए तो जल ग्रहण क्षेत्र के वनों में नर्मदा की जान बसती है और जंगल उसके प्राण दाता है, यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी। अब प्रश्न यह उठता है कि क्या जंगल वास्तव में विहीन नदियों के लिए प्राण दाता की भूमिका निभाते हैं या यह केवल एक भावनात्मक वक्तव्य है? वैज्ञानिक तथ्यों से यह स्पष्ट होता है कि जंगल सीधे-सीधे नर्मदा के प्रभाव को जितना प्रभावित नहीं करते उससे कहीं अधिक परोक्ष रूप से सहायक नदियों को प्रभावित करते हैं।

अमरकंटक

वनों का घनत्व, वनस्पति प्रजातियों की संरचना और भूगर्भी सेल संरचना नदियों के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। वन-नदियों में प्रवाह की मात्रा उसकी निरंतरता और गुणवत्ता तीनों को प्रभावित करके अपना काम करते हैं और जलधाराओं को सफल, अविरल और निर्मल बनाते हैं। नर्मदा बेसिन में होने वाली वर्षा में वन आवरण चमत्कारी काम करते हैं, जहां वन का घनत्व और स्वास्थ्य अच्छा होता है वहां जल का जमीन की सतह के नीचे बहना अच्छा होने से नदियां सदा निरा और निर्मल बनी रहती है।

घने जंगल में पानी की बूँदें पहले वृक्षों की पत्तियों तथा तनों, डालियों, झाड़ियों आदि से टकराती हैं। इस टकराहट से इन बूँदों का आकार और गति कम होती है। जमीन पर इन बूँदों को सीधे पहुँचने के पहले अनेक बैरिकैड़सका सामना करना पड़ता है। वृक्ष की पत्तियों से मुलाकात करती हुई जब ये बूँदे नीचे धरती पर पहुँचती हैं, तो घास के तिनके इनके स्वागत में हाथ में वंदनवार लिये खड़े होते हैं। यानी यहाँ भी एकदम सीधे मिट्टी से इनका सम्पर्क नहीं हो पाता है। …बरसात की ये बूँदें अहिस्ता-आहिस्ता जमीन में समाती जाती हैं। यदि जंगल घना है जो बरसात कितनी ही तेज क्यों न हो, बूँदें तो अपनी गति इन अवरोधों के बहाने कम करती हुई मिट्टी के कणों के सामने बड़े अदब से पेश आती हैं। जब मिट्टी से इन बूँदों का सम्पर्क होता है तो जमीन की ऊपरी सतह पर मौजूद घास, बेलें और झाड़ियों की जड़ें इन्हें बहने से रोकते हुए जमीन के भीतर जाने की मनुहार करती हैं। बूँदे ये मनुहार स्वीकार करती हुई बड़े पेड़ों की जड़ों के आसपास से होती हुई, जमीन के भीतर और भीतर समाती जाती हैं। नीचे गई बूँदें काफी समय बाद तक तलहटी के खेतों में नमी बनाए रखती हैं। यही बूँदें आसपास के कुंओं में जाकर वहाँ के जलस्तर को ऊपर उठा देती हैं। विंध्य और सतपुड़ा पर्वतों में नर्मदा घाटी में मौजूद घने जंगलों को नर्मदा की जान कहना केवल साहित्य व अलंकारिक दृष्टि से ही नहीं बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से बिल्कुल सही है।

जंगलों के रहने और नर्मदा के बहने के बीच की अदृश्य जुगलबंदी को समझने और नर्मदा व इसकी सहायक नदियों के प्रवाह की निरंतरता तथा जल की गुणवत्ता बनाए रखने में वनों की भूमिका का वैज्ञानिक आधार समझना आवश्यक है। जंगल बादलों के उतरने की हवाई अड्डे हैं, देखने में भी आता है कि जहां घने वन होते हैं वहां उनकी आद्रता से द्रवित होकर बादलों का बरसना अधिक होता है। नर्मदा के प्रभाव को निरंतर में अविरल बनाए रखने में नर्मदा अंचल के वनों की भूमिका बड़ी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां हिमालय से निकलने वाली नदियों की तरह बर्फीले हिमनदों के पिघलने से लगातार जल प्राप्त नहीं होता और यहां जल आपूर्ति का एकमात्र स्रोत मानसूनी वर्षा है अर्थात मानसूनी वर्षा के दौरान मिले पानी से ही यहां के नदी नालों को साल भर काम चलाना पड़ता है।

नर्मदा अंचल में भी पहाड़ी सघन वनों से युक्त इलाकों में छोटी-छोटी जलधाराएं लंबे समय तक अविरल बहती रहती हैं,कभी नर्मदा तट पर दंडकारण्य जैसे घनेवन जंगलों की भरमार थी, इन्हीं जंगलों के कारण वैदिक आर्य तो नर्मदा तक पहुंचे ही नहीं। कहां गए दंडकारण्य? अगर बचे हुए जंगल भी कट गए तो नदियां बहना बंद कर देंगी, धरती श्री हीन हो जाएगी, जंगल और नदी की जुगलबंदी के कारण नदियों में 12 महीना पानी रहता है अगर यह जुगलबंदी टूट गई तो नदियों में कंकड़- पत्थर के सिवा और कुछ ना रहेगा, क्या हम ऐसी नदियां चाहते हैं? कदापि नहीं!

जय हो मां नर्मदा मैया की!

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