शूलपाणि के जंगल और शूलपाणेश्वर महादेव मंदिर नर्मदा परिक्रमा के रोमाचंक और रहस्यमयी स्थल है। जिससें वर्तमान में तो परिक्रमावासियों के जुड़े अनुभव सिर्फ दुर्गम रास्तों और शांति सकुन से जूड़े हो सकते है लेकिन इस नाम से जुड़ा पौराणिक महत्तव इसकी महत्ता को गहराई से समझा देता है। स्कंद पुराण के रेवाखंड में शूलपाणि और शूलपाणेश्वर मंदिर के रहस्यों का वर्णन किया गया है। वर्तमान में समय में ना शूलपाणि वन का वह स्वरूप है ना ही शूलपाणेश्वर मंदिर का वह पौराणिक महत्व बचा है। आज के समय में परिक्रमावासी शूलपाणि वन को दुर्गम मार्ग के रूप में ही जानते है।

मां नर्मदा ने धो दिया था त्रिशूल पर लगा रक्त
पृथ्वी पर भगवान भोलेनाथ ने जब जंभासुर नामक असुर का वध किया। तो वह रक्त से त्रिशूल पर लग गया। भगवान शिव ने त्रिशूल से उस दैत्य का रक्त हटाने के लिए त्रिशूल को सभी तीर्थों में धोया लेकिन असूर का रक्त त्रिशूल से नहीं छूटा और अंततः भगवान शिव ने शूलपाणि क्षेत्र में अपने दोनों हाथों से पर्वत पर अपना त्रिशूल फेंका, जिससे पर्वत पाताल में चला गया। उसी समय मां नर्मदा ने त्रिशूल पर लगे रक्त को धो दिया। इस स्थान पर ही भगवान शिव के त्रिशूल की शुद्धि हुई थी। इसके बाद भगवान शिव को शांति मिली और उन्होने यहां पर ही विश्राम किया। जिसके बाद शूलपाणि पर्वत और शूलपाणेश्वर मंदिर के पास से गुजरते हुए परिक्रमावासियों के सभी पाप धुल जाते है और मन की शांति मिलती है।
बांध निर्माण के दौरान डूब गया मंदिर
शूलपाणेंश्वर मंदिर गुजरात के नर्मदा जिले में केवड़िया में स्थित एक प्रसिद्ध मंदिर है, जो भगवान शिव को समर्पित है। इस मंदिर का निर्माण पांडवों ने कराया था। वर्तमान में यह मंदिर सरदार सरोवर बांध के निर्माण के कारण जलाशय में डूब गया, लेकिन बाद में इसके पास में ही एक नए स्थान पर नए शिव मंदिर का निर्माण किया गया। 7 मई, 1994 को इसकी प्राण-प्रतिष्ठा की गई थी। फिलहाल यह मंदिर स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी के पास नर्मदा नदी के किनारे स्थित है। मां नर्मदा की परिक्रमा करने वाले भक्तों और स्थानीय आदिवासियों के लिए भी यह श्रद्धा का केंद्र है।
आदिवासी समाज का लगता है मेला
शूलपाणेश्वर मंदिर गुजरात में नर्मदा जिले का एक प्रसिद्ध मंदिर है, जिसे शूलपाणेश्वर महादेव मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। यह मंदिर नर्मदा के तट पर स्थित सबसे पवित्र मंदिरों में से एक माना जाता है। शूलपाणेश्वर मंदिर तीर्थयात्रियों के साथ-साथ माँ नर्मदा की परिक्रमा करने वाले भक्तों के लिए भी श्रद्धा का केंद्र बन गया है। हर साल चैत्र माह की 13 और 14 तारीख को यहाँ महाराष्ट्र के स्थानीय लोगों, आदिवासियों और वनवासियों द्वारा मेला लगता है। इस नए शूलपाणेश्वर मंदिर में भी बड़ी संख्या में लोग पूजा-अर्चना के लिए आते हैं।

स्कंद पुराण में ऐसा है महत्व
शूलपाणेश्वर तीर्थ को नर्मदा जी का ह्रदय क्षेत्र माना जाता है। इस अति पावन तीर्थ की स्थापना स्वयं शिवजी ने कि थी। असुर को त्रिशुल मारने के बाद सभी तीर्थो के जल में त्रिशूल धोने के बाद भी रक्त नहीं धूला तो शिव ने भृगु पर्वत पर आकर अपने त्रिशूल को पर्वत पर मारा। इससे पर्वत पाताल में चला गया और वहां से सरस्वती गंगा प्रकट हुई और त्रिशूल के दाग भी धूल गए। जहाँ शूल से भेद किया था वहां एक कुंड बन गया जिसमे सरस्वती गंगा और नर्मदा जल एकाकार होकर चक्रतीर्थ के नाम से प्रसिद्द हुआ। इस शूल के भेदने से उत्पन्न इस तीर्थ का नाम ‘शूल भेद’ हुआ। भगवान शिव ने अपने ‘पाणी’ अर्थात हाथों से शूल भेदन किया इसलिए इस स्थान का नाम ‘शूलपाणि’पड़ा और शूलपाणेश्वर महादेव की यहां पूजा होती है।


