Narmada

नर्मदा परिक्रमा के दुर्गम मार्ग शूलपाणी के जंगलो में श्री अवधेश चैतन्य ब्रह्मचारी जी महाराज

राजसंमद जिले के कुंभलगढ़ तहसील में स्थित सूरजकुंड धाम के संतश्री अवधेश चैतन्य ब्रह्मचारी जी महाराज जिनके तेजोप्रकाश से सूरजकुंड धाम की प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैली है। संतश्री इस वर्ष चातुर्मास से नर्मदा की शरण में आए है। संतश्री ने मध्यप्रदेश की जीवनदायिनी मां नर्मदा की परिक्रमा ओंकारेश्वर से शुरू की।
वह मां नर्मदा से मिलने के लिए नर्मदा परिक्रमा पर निकल पड़े है। मान्यता यह है कि नर्मदा परिक्रमा के दौरान संतों को मां नर्मदा मैया अवश्य दर्शन देती है। मां नर्मदा को शिव की पूत्री माना जाता है। मां नर्मदा के रहस्यों का वर्णन तो शब्दों में कर पाना संभव नहीं है लेकिन मां नर्मदा का आर्शीवाद पाने के लिए  संत भी लालयित रहते है। मां नर्मदा के किनारे संतों को सिद्धि मिलती है। जो संत सिद्धि प्राप्त कर चुके है उन्हें मां नर्मदा के दर्शन प्राप्त होते है। मां नर्मदा का आर्शीवाद पाने के लिए संतश्री भी मां नर्मदा की परिक्रमा पर निकल पड़े है।

कठिर डगर पर निकल पड़े संतश्री
मां नर्मदा परिक्रमा के बारे में कहा जाता है कि मां की परिक्रमा जो सच्चे मन से करता है उसे मां नर्मदा अवश्य ही दर्शन देती है। संतश्री भी मां का आर्शीवाद पाने के लिए कठिन पथ पर चल पडे है। संतश्री की मध्यप्रदेश के बड़वानी ज़िले से शुरू होते शूलपाणी के जंगलो में नर्मदा के किनारे यात्रा कर रहे है। इस पैदल नर्मदा परिक्रमा में संतश्री लगभग 50 किमी का क्षेत्र बियाबान जंगलो के दुर्गम रास्तों पर तय कर रहे है। इस जंगल को आज भी कदमों के निशान से ही पार किया जाता है।

घनें जंगलो में विराजे थे शिव
ऐसी मान्यता है कि शूलपाणि भगवान शिव के पावन पदचिह्नों का साक्षी है, जब उन्होंने इस क्षेत्र में मीलों तक यात्रा की थी। ऐसा कहा जाता है कि भगवान शिव ने य़हां स्थित प्राचीन मंदिर के जल में अपने त्रिशूल को शुद्ध करने के लिए भी विश्राम किया था, जो कभी इस क्षेत्र में स्थित था, और अब सरदार सरोवर बाँध की गहराई में डूबा हुआ है। यहीं पर उनका देवी से मिलन हुआ था। भगवान शिव इन पहाड़ों में विद्यमान हैं, क्योंकि वे निश्चित रूप से वहीं होंगे जहाँ उनके भक्त हैं। यह आकर्षण वास्तव में मनमोहक है लेकिन दुर्गम मार्ग पर है। शिव के भक्त और मां नर्मदा के भक्त इस घने जंगल में यात्रा करके अदभूत शक्ति भी प्राप्त करके है। यह जंगल मां नर्मदा के आर्शीवाद से ही पार किया जा सकता है। कई बार परिक्रमावासी मार्ग भटक जात है जिन्हें मां नर्मदा स्वयं  रास्ता दिखाने कई रूप धर के आती है।

आज भी रहते है अश्वत्थामा
नर्मदा परिक्रमा पथ पर शूलपाणि का जंगल मध्यप्रदेश और गुजरात राज्य के बीच में  पड़ता है। जहां मां नर्मदा पहाड़ों के बीच से लुकाछिपी खेलते हुए इस  बियाबान जंगल से गुजरती है और परिक्रमावासी मां का सानिध्य पाने के लिए इस घने जंगल की पहाड़ियों रे बीच से गुजरते है। जहां कभी मां का दर्शन होता है तो कही मां छुप जाती है। जिसे  जिसके दर्शन करने के लिए परिक्रमावासी इस घने जंगल में से गुजरते है। घोर जंगल में शूलपाणेश्वर महादेव का मंदिर स्थित है। कहा जाता है कि यहां निवास करने वाली भील जनजाति के मध्य में ही द्रोणपुत्र अश्वत्थामा रहते है। नर्मदा परिक्रमा पथ पर कई संतों ने उनके दर्शन प्राप्त किए है। ऐसे ही घने जंगलों से संतश्री मां नर्मदा का आर्शीवाद प्राप्त कर रहे है।

परिक्रमावासियो की होती है अग्निपरीक्षा
यह क्षेत्र परिक्रमावासियों के लिए एक कठिन और जोखिम भरा रास्ता माना जाता है, लेकिन कई लोग इसे माँ नर्मदा के करीब जाने के अवसर के रूप में चुनते हैं। यह उन लोगों के लिए “अग्नि परीक्षा” की तरह है।  जो इस रास्ते को अपनाते हैं। वह एक प्राचीन मार्ग का अनुसरण करते है। यह ऐसा मार्ग है जिसके लिए शारीरिक और मानसिक शक्ति की आवश्यकता होती है, और लोग अक्सर इसे “माँ नर्मदा के आशीर्वाद” से पार करते हैं। इस जंगल में यात्रा करते समय अक्सर किसी और इंसान से मिलना नहीं होता, जो कि एक अद्वितीय और आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करता है

 

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