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पौष मास में होता है छोटा ‘पितृ पक्ष’तर्पण और पिण्डदाने से प्रसन्न होते है पूर्वज

पूर्वजो का आर्शीवाद मिलता रहे तो व्यक्ति के जीवन में सुख-शांति बनी रही है। पितृ के प्रसन्न ना होने के कारण कई तरह की बाधाएं आती है। जहां पितृ पक्ष में लोग अपने पितरों के लिए तर्पण-पिण्डदान करते है। ऐसे ही पौष माह को छोटा ‘पितृ पक्ष’कहा जाता है। इस माह में पितरों के लिए तर्पण और पिंडदान किया जाता है।

गयाजी में मिलती है मुक्ति
गया जी में देश भर से लोग पितरों के तर्पण के लिए जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस दिन पितरों की पूजा करने पर उन्हें मुक्ति मिलती है। सनातन परंपरा में गया को पितृ मोक्ष की सबसे पवित्र नगरी माना गया है। अष्टादश पुराणों में मोक्षदायक माने गए वायु पुराण के साथ-साथ अग्नि, वाराह, विष्णु और स्कंद पुराण में भी स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि गया तीर्थ में वर्ष के किसी भी समय श्राद्ध और पिंडदान किया जा सकता है।
पितृपक्ष ही नहीं, वर्ष में चार विशेष काल
आमतौर पर पितृपक्ष को ही श्राद्ध का प्रमुख समय माना जाता है, जो भाद्रपद पूर्णिमा से अश्विन अमावस्या तक चलता है. लेकिन शास्त्रों के अनुसार मार्गशीर्ष पूर्णिमा से पौष अमावस्या तक का समय भी गया में पिंडदान के लिए उतना ही महत्वपूर्ण है. इसी वजह से इसे ‘मिनी पितृपक्ष’ कहा जाता है. इसके अलावा फाल्गुन पूर्णिमा से चैत्र अमावस्या और ज्येष्ठ पूर्णिमा से आषाढ़ अमावस्या तक की अवधि भी पितृकर्म के लिए उत्तम मानी गई है. इस तरह शास्त्रों में पितरों के लिए वर्ष में चार विशेष पक्ष स्वीकार किए गए हैं.

96 तिथियां जो पितरों के लिए है श्रेष्ठ
धर्मग्रंथों के अनुसार एक वर्ष में कुल 96 तिथियां ऐसी हैं, जिन्हें पितरों के तारण के लिए सबसे उपयुक्त बताया गया है. इनमें 12 अमावस्या, 14 युगादि तिथि, 14 मन्वादि तिथि, 12 संक्रांति, 12 वैधृति योग, 12 व्यतिपात योग, 15 महालया, पांच अष्टका, पांच अनविष्टका और पांच पूर्वेधु के काल शामिल है।

सूर्य-गोचर और गया तीर्थ का महत्व
वायु पुराण में बताया गया है कि जब सूर्य मीन, मेष, कन्या, धनु या वृष राशि में होते हैं, तब गया तीर्थ का महत्व और बढ़ जाता है. ऋषियों का भी मत है कि तीनों लोकों में गया का पिंडदान अत्यंत दुर्लभ और पुण्यदायक है. पौष मास का नाम चंद्रमा के पुष्य नक्षत्र में होने से पड़ा है और इसी महीने में खरमास भी लगता है. यह समय भगवान विष्णु और सूर्य की आराधना के लिए भी श्रेष्ठ माना गया है.

पौष अमावस्या और खरमास का विशेष योग
पंडितों के अनुसार पौष मास का पितृपक्ष पितरों के लिए अत्यंत कल्याणकारी होता है, लेकिन इसकी अमावस्या का महत्व और भी बढ़ जाता है. 16 दिसंबर से सूर्य के धनु राशि में प्रवेश के साथ खरमास शुरू होता है. इस दौरान पितृ-पूजन अधिक प्रभावशाली माना गया है। मकर संक्रांति पर गंगासागर जाने वाले श्रद्धालु भी गया में पिंडदान करके ही आगे बढ़ते हैं.

 

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