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Narmada

प्रेम से प्रण तक एक अनकही प्रेमकहानी “मां नर्मदा”

मां नर्मदा अपने प्रण को पूरा करने वाली नदी है। इसलिए साधु संत मां नर्मदा के किनारे तपस्या करते है जिससे उनका आध्यात्मिक प्रण पुरा होता है। मां नर्मदा ने मन के वेग को त्याग और तपस्या में बदला यह संदेश मां नर्मदा के किनारे मिलता है। मां नर्मदा आज के नवयुवाओं को लिए भी संदेश देती है जो अपना नहीं है उसे छोड़ कर जीवन में आगे बढ़ जाना चाहिए।

मां नर्मदा कहने को तो आज के आधुनिक युग में एक नदी है। जो मध्यप्रदेश की जीवनदायिनी है। जो अमरकंटक से निकलती है और अरब सागर में मिलती है। जो एक मात्र ऐसी नदी है जो अरब सागर में मिलती है। जिसे आधुनिक समाज भी एक उल्टी दिशा में बहने वाली नदीं मानता है। लेकिन यह एक प्रेम में धोखे की अदभूत प्रेम कहानी भी है।
जिसमें एक महिला के मन की पीड़ा है जो प्रेम के लिए होती है। जिसमें जब प्रेम में धोखा मिला तो वह प्रेम एक प्रण में बदल गया। प्रण ऐसा जिसने उसे पुज्यनीय बना दिया। वह प्रण एक त्याग था तो अब एक मानव जगत के लिए प्राणदायी बन गया। यह प्रण ही आध्यात्मिक जगत में मां नर्मदा को ज्याद महत्व देता है। साधु संत भी इस नदीं के तट पर तपस्या करते है। यह नदीं सबकों प्रण लेने का महत्व भी बताती है। तो आइए जानते है मां नर्मदा की प्रेम कहानी

चिरकुवांरी मां नर्मदा
नर्मदा की कथा जनमानस में कई रूपों में प्रचलित है लेकिन चिरकुवांरी नर्मदा का सात्विक सौन्दर्य, चारित्रिक तेज और भावनात्मक उफान नर्मदा परिक्रमा के दौरान हर संवेदनशील मन महसूस करता है। कहने को वह नदी रूप में है लेकिन चाहे-अनचाहे भक्त-गण उनका मानवीयकरण कर ही लेते है। पौराणिक कथा और यथार्थ के भौगोलिक सत्य का सुंदर सम्मिलन उनकी इस भावना को बल प्रदान करता है ।

ऐसी है मां नर्मदा की प्रेम कहानी
नर्मदा नदी को लेकर कई लोक कथायें प्रचलित हैं।  कई हजारों वर्ष पहले की बात है। नर्मदा जी राजा मैखल के घर नदी बनकर जन्मीं। सोनभद्र नद बनकर जन्मा। दोनों के घर पास थे। दोनों अमरकंट की पहाड़ियों में घुटनों के बल चलते। चिढ़ते-चिढ़ाते। हंसते-रुठते। दोनों का बचपन खत्म हुआ। दोनों किशोर हुए। लगाव और बढ़ने लगा। तभी राजा मैखल ने नर्मदा से शादी के लिए घोषणा की कि जो राजकुमार गुलबकावली के फूल उनकी बेटी के लिए लाएगा, उसके साथ नर्मदा का विवाह होगा। नद सोनभद्र यह फूल ले आए और उनका विवाह तय हो गया। जब दोनो जवान हुए तो उन दोनों ने कसमें खाई। जीवन भर एक-दूसरे का साथ नहीं छोड़ने की। एक-दूसरे को धोखा नहीं देने की। विवाह नर्मदा का सोनभ्रद के साथ तय हो ही चुका था। तब दोनो को देखने की इच्छा हुई। लेकिन राजकुमारी होने के चलते वह मिलने नहीं जा पाती थी तो उन्होने अपनी सहेली के साथ सोनभ्रद को मिलने का संदेश भेजा।
सहेली ने किया धोखा
संदेश लेकर जब सहेली जुहिला नदीं को भेजा तो सोनभद्र ने सामने नर्मदा की सखी जुहिला नदी को देखा और सोनभ्रद का मन भटक गया। उसने जब सोलह श्रृंगार किए हुए, वन का सौन्दर्य लिए नवयुवती जुहिला नदी को देखा जुहिला के मन में भी सोनभ्रद के लिए प्रेम जाग उठा।  उसने अपनी अदाओं से सोनभद्र को मोह लिया। सोनभद्र अपनी बाल सखी नर्मदा को भूल गया। जुहिला को भी अपनी सखी के प्यार पर डोरे डालते लाज ना आई। नर्मदा ने बहुत कोशिश की सोनभद्र को समझाने की। लेकिन सोनभद्र तो जैसे जुहिला के लिए बावरा हो गया था।

असहनीय प्रेमपीड़ा में लिया प्रण
नर्मदा ने किसी ऐसे ही असहनीय क्षण में निर्णय लिया कि ऐसे धोखेबाज के साथ से अच्छा है इसे छोड़कर चल देना। कहते हैं तभी से नर्मदा ने अपनी दिशा बदल ली। सोनभद्र और जुहिला ने नर्मदा को जाते देखा। सोनभद्र को दुख हुआ। बचपन की सखी उसे छोड़कर जा रही थी। उसने पुकारा- ‘न…र…म…दा…रूक जाओ, लौट आओ नर्मदा। लेकिन नर्मदा जी ने हमेशा कुंवारी रहने का प्रण कर लिया। युवावस्था में ही सन्यासिनी बन गई। रास्ते में घनघोर पहाड़ियां आईं। हरे-भरे जंगल आए। पर वह रास्ता बनाती चली गईं। कल-कल छल-छल का शोर करती बढ़ती गईं। मंडला के आदिमजनों के इलाके में पहुंचीं। कहते हैं आज भी नर्मदा की परिक्रमा में कहीं-कहीं नर्मदा का करूण विलाप सुनाई पड़ता है।

प्रण का संदेश देती मां नर्मदा
मां नर्मदा अपने प्रण को पूरा करने वाली नदी है। इसलिए साधु संत मां नर्मदा के किनारे तपस्या करते है जिससे उनका आध्यात्मिक प्रण पुरा होता है। मां नर्मदा ने मन के वेग को त्याग और तपस्या में बदला यह संदेश मां नर्मदा के किनारे मिलता है। मां नर्मदा आज के नवयुवाओं को लिए भी संदेश देती है जो अपना नहीं है उसे छोड़ कर जीवन में आगे बढ़ जाना चाहिए।

 

 

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