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बड़ों के सामने छोटे बनते रहेंगे तो हम अपनेआप बड़े बन जाएँगे  

बड़ों के सामने छोटे बनते रहेंगे तो हम अपनेआप बड़े बन जाएँगे

दलाल बाग में चल रहे चातुर्मास के विराट आयोजन में राष्ट्रसंत सुधासागर म.सा. के प्रेरक आशीर्वचन

 

इंदौर,। मकान जितना ऊँचा होगा, उसकी नींव उतनी ही नीचे रखना जरुरी है। भगवान बनना बड़ी बात नहीं है, जैन दर्शन में कहा गया है कि तुम भगवान के सामने छोटे बन जाओगे तो भगवान बनने का रास्ता खुल जाएगा। बड़ों के सामने छोटे बनते रहेंगे तो हम अपनेआप बड़े बन जाएँगे। आजकल हर कोई गुरु बनना चाहता है, शिष्य बनना कोई पसंद नहीं करता। गुरु वही बन सकता है जो अच्छा शिष्य बनेगा। दुनिया उसी को नमस्कार करेगी जो दूसरों को नमस्कार करता है। हम कैसे महान बनें और किस तरह आकाश को छूने में कामयाब हों, कैसे हमें उत्कृष्ट सम्मान मिले-इन सब के लिए एक ही मन्त्र याद रखें कि हमें झुकना आना चाहिए। नमोकार मंत्र सभी मन्त्रों का राजा इसीलिए है कि इस मंत्र में सबके प्रति विनय और सम्मान का भाव है।

संत शिरोमणि प.पू. विद्यासागर म.सा. के परम प्रभावक शिष्य और राष्ट्रसंत मुनि पुंगव प.पू. श्री सुधासागर महाराज ने सोमवार को सकल दिगम्बर जैन धर्म प्रभावना समिति के तत्वावधान में दलाल बाग के विशाल विद्या-सुधा सत्संग मंडप में चल रहे चातुर्मास की महती धर्मसभा में उपस्थित भक्तों को आशीर्वचन देते हुए उक्त प्रेरक विचार व्यक्त किए। प्रारम्भ में पाद प्रक्षालन और श्रीफल अर्पित करने का सौभाग्य अशोक-रानी डोसी, हर्ष-तृप्ति जैन परिवार और शास्त्र भेंट करने का सौभाग्य चक्रवर्ती नवीन-शिवानी गोधा, मनीष-सपना गोधा परिवार को मिला। पार्श्व जयघोष स्मृति नगर द्वारा किया गया जबकि मंगल ध्वज की स्थापना आयोजन समिति द्वारा की गई। आयोजन समिति की ओर से नवीन गोधा, मनीष गोधा, अशोक डोसी, हर्ष जैन, आकाश जैन कोयला आदि ने देशभर से आए सभी साधकों की अगवानी की। चातुर्मास के दौरान दलाल बाग पर प्रतिदिन सुबह 8 से 9.30 बजे तक धर्मसभा में राष्ट्रसंत सहित सभी संत विद्वानों के प्रवचनों की अमृत वर्षा जारी है। चातुर्मास के दौरान विभिन्न अनुष्ठान भी होंगे।

राष्ट्रसंत ने महती धर्मसभा में कहा कि नमोकार मंत्र में पहले नमस्कार है। संसार का यही एकमात्र ऐसा मंत्र है जिसमें नमस्कार पहले है। बड़ा पद देखकर सबका मन ललचाता है। कोई भगवान या गुरु नहीं कहेगा कि मेरे सामने झुको और जैन दर्शन में भी न भगवान और न ही गुरु कहते हैं कि मुझे नमस्कार करो। वे केवल देखते हैं कि तुमको नमस्कार करते आता भी है या नहीं। जब हम अपना मस्तक गुरु चरणों में समर्पित कर देते हैं तो यही गुरु सेवा कहलाती है। याद रखें कि संसार में सबसे बड़ा दुःख तब होता है जब हमें अपने दुश्मनों के सामने झुकना पड़ता है। मोक्ष मार्ग कहता है कि जहाँ-जहाँ झुकने में हमें आनंद मिलता है, वहीं से मोक्ष का मार्ग खुलने लगता है। गुरु चरण में झुकने में सबसे ज्यादा आनंद मिलता है। आशीर्वाद थोड़े दिन की ख़ुशी दे सकता है लेकिन यह बहुत घाटे का सौदा है। आशीर्वाद हमारे पिता की कमाई है, जिससे थोड़ी देर के लिए हमारी इच्छा पूरी हो सकती है लेकिन नमस्कार करने में जो कमाई होगी वह हमारी अपनी होगी। जैन दर्शन में चरणों की नहीं, चरण चिन्हों की पूजा का महत्व है। गुरु चरणों की धूल बन जाएँगे तो इतनी ताकत आ जाएगी कि गुरु का नाम लेकर अस्पताल में भर्ती मरीज को भी आशीर्वाद देंगे तो उसका लाभ मिल जाएगा। गुरु के सामने अपनी बुराई का बुरे काम को स्वीकार कर लोगे तो गुरु तुमको अपने गले लगा लेंगे। जीवन का सही आनंद विनयशील व्यक्तित्व बनने में ही मिले

गा।

 

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