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भागवत से ही वह विवेक मिलेगा जिससे हम सत्य की प्राण प्रतिष्ठा कर धर्म-संस्कृति के मार्ग पर चल सकें

भागवत से ही वह विवेक मिलेगा जिससे हम सत्य की प्राण प्रतिष्ठा कर धर्म-संस्कृति के मार्ग पर चल सकें

माहेश्वरी मांगलिक भवन पर चल रहे भागवत ज्ञान यज्ञ में वृन्दावन के भागवताचार्य मनीष भाई का सम्मान

 

इंदौर। वर्तमान दौर में हमें सनातन धर्म की मजबूती के लिए एकजुट होकर दुष्ट प्रवृत्तियों का मुकाबला वैसे ही करना होगा, जैसा द्वापर युग में भगवान कृष्ण ने किया। भागवत जैसे धर्म ग्रन्थ से ही हमें वह विवेक मिलेगा, जिससे हम सत्य की प्राण प्रतिष्ठा कर धर्म और संस्कृति के मार्ग पर चल सकें। ऐसा होने पर हम अपने कर्मों को सुधारकर एक ऐसे परिवार, समाज और राष्ट्र का निर्माण कर सकते हैं, जहाँ अनीतियों का संगठित होकर मुकाबला किया जा सकता है।

                     ये दिव्य विचार हैं श्रीधाम वृन्दावन के भागवताचार्य मनीष भाई के, जो उन्होंने एबी रोड, चिड़ियाघर के सामने स्थित माहेश्वरी मांगलिक भवन पर चल रहे भागवत ज्ञान यज्ञ में समापन प्रसंग पर व्यक्त किए। इस अवसर पर आयोजन समिति की ओर से समाजसेवी राजेंद्र प्रसाद केडिया, राधेश्याम अग्रवाल, सुनील केडिया, प्रवीण कुमार केडिया, मनीष अग्रवाल सहित अनेक बंधुओं ने व्यास पीठ का पूजन कर विद्वान वक्ता का सम्मान किया। कथा समापन पर भवन परिसर में भागवतजी की शोभा यात्रा भी निकाली गई, जिसमें केडिया दम्पत्ति ने भागवतजी को नंगे पैर मस्तक पर धारण किया। इसके पूर्व कथा में कृष्ण-सुदामा मैत्री का उत्सव भी धूमधाम से मनाया गया।

आचार्य मनीष भाई ने कहा कि भागवत का चिंतन हमें सकारात्मक जीवन का विचार देता है। श्रेष्ठ विचार ही हमारे कर्मों को श्रेष्ठ बनाते हैं। आज समाज अर्थ प्रधान होता जा रहा है। रिश्ते गौण हो गए हैं और धन प्राथमिकता पर आ गया है। कंस व्यक्ति नहीं, प्रवृत्ति है जो आदिकाल से चली आ रही है। दुष्टों और असुरों की कोई अलग शक्ल नहीं होती लेकिन उनकी प्रवृत्तियां मानवता के विरुद्ध होती है। ऐसे लोगों को परमात्मा भी क्षमा नहीं कर

सकते।

 

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