इंदौर(विनोद गोयल)। शहर में विगत तीन दिनों तक परंपरा, प्रकृति और जनजातीय संस्कृति की जीवंत धड़कनों से सराबोर रहा 'जात्रा-2026' रविवार को गांधी हॉल परिसर में गरिमामय समापन समारोह के
इंदौर(विनोद गोयल)। कुछ कलाएँ देखने के लिए नहीं, महसूस करने के लिए होती हैं। पिथोरा भी ऐसी ही एक कला है, जो रंगों से ज्यादा विश्वास, रेखाओं से ज्यादा रिश्तों
इंदौर(विनोद गोयल) जनजातीय संस्कृति किसी समुदाय की सिर्फ पहचान नहीं, बल्कि उसकी स्मृतियों, जीवनशैली और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं की जीवंत अभिव्यक्ति होती है। इसी सांस्कृतिक विरासत के




