मां नर्मदा के ओंकारेश्वर से मोरटक्का के बीच बहती नर्मदा नदी के तट पर ठंड में अपना बसेरा बनाने वाले चकवा-चकवी जिन्हें बाह्मणी बत्ख भी कहा जाता है ने अपना
कलयुग में धर्म खत्म हो जाएगा। यह तो हम कई बार सुनते है लेकिन इस धर्म को खत्म करने वाले भी हम ही होंगे इस पर कभी विचार मंथन किया
भोपाल मौसम विभाग के सेवानिवृत्त मौ.वि.अ. मौ.के. डॉ.जी.डी मिश्रा ने अपने एक लेख में नर्मदा के किनारे तेजी से घट रहे वनक्षेत्र पर लिखा है कि वनक्षेत्र कम होने से
शूलपाणि के जंगल और शूलपाणेश्वर महादेव मंदिर नर्मदा परिक्रमा के रोमाचंक और रहस्यमयी स्थल है। जिससें वर्तमान में तो परिक्रमावासियों के जुड़े अनुभव सिर्फ दुर्गम रास्तों और शांति सकुन से
सूरजकुंड, 15 नवंबर 2025 (दिव्यभूमि न्यूज): हिंदू धर्म की पवित्र परंपराओं में नर्मदा परिक्रमा एक अत्यंत महत्वपूर्ण तीर्थयात्रा मानी जाती है, जो भक्तों को आत्मिक शुद्धि और मोक्ष की ओर
मां नर्मदा अपने प्रण को पूरा करने वाली नदी है। इसलिए साधु संत मां नर्मदा के किनारे तपस्या करते है जिससे उनका आध्यात्मिक प्रण पुरा होता है। मां नर्मदा ने
मां नर्मदा, जिसे भौतिक जगत में नदी कहा जाता है। लेकिन जब इसे आध्यत्मिक रूप से देखा जाता है तो मां नर्मदा जीवन को बदलने वाली आत्म शुद्दि स्वरूपा दिखाई








