Eternal Hinduism

जितने भक्त भारत में हुए, उतने कहीं और किसी भी देश में नहीं हुए – स्वामी प्रणवानंद सरस्वती

इंदौर(विनोद गोयल)  भक्ति किसी भी रूप में हो, उसका प्रतिफल अवश्य मिलता है। हिंदू सनातन धर्म को शास्त्रों ने भी मानव धर्म की मान्यता प्रदान की है। दया, करुणा, परमार्थ और सद्भाव के साथ भाईचारे जैसे गुण हिंदू धर्म के मूलतत्त्व हैं। महर्षि वेद व्यास ने भागवत जैसे कालजयी ग्रन्थ की रचना किसी एक समुदाय या वर्ण विशेष के लिए नहीं बल्कि मानव मात्र के लिए की है। भगवान के चौबीस अवतार भी सभी वर्णों और समाज के लिए हुए हैं।

ईश्वर किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं है। भगवान की दृष्टि में कोई जाति भेद नहीं होता। जितने भक्त भारत में हुए, उतने कहीं और किसी भी देश में नहीं हुए। ये प्रेरक विचार हैं अखंड प्रणव वेदांत आश्रम, झलारिया के महामंडलेश्वर स्वामी प्रणवानंद सरस्वती के, जो उन्होंने झलारिया बायपास स्थित रूचि लाइफ स्केप पर चल रहे भागवत ज्ञान यज्ञ में भक्त प्रह्लाद एवं ध्रुव चरित्र की व्याख्या के दौरान व्यक्त किए।

उत्सवो में उमड़ रही है भीड़
अखंड प्रणव वेदांत आश्रम पर मुख्य यजमान समाजसेवी सुरेश-मृदुला शाहरा, श्रीमती कल्पना भाटिया एवं अन्य श्रद्धालुओं ने प्रारंभ में व्यासपीठ का पूजन किया। समापन पर सैकड़ों भक्तों ने आरती में भाग लिया। महामंडलेश्वर स्वामी प्रणवानंद सरस्वती यहाँ मंगलवार 13 जनवरी तक प्रतिदिन दोपहर 3 से सांय 7 बजे तक भागवत कथामृत की वर्षा करेंगे।

शनिवार 10 जनवरी को कृष्ण जन्मोत्सव, 11 को बाल लीला एवं गोवर्धन पूजन, 12 को रूक्मणी स्वयंवर तथा 13 जनवरी को सुदामा चरित्र एवं परीक्षित मोक्ष के साथ कथा का विश्राम होगा। कथा प्रसंगानुसार उत्सव भी मनाए जाएंगे। बुधवार 14 जनवरी को दोपहर 2 से 5 बजे तक हवन एवं पूर्णाहुति के साथ समापन होगा। आयोजन में बड़ी संख्या में शहर एवं अन्य क्षेत्रों के श्रद्धालु भागीदार बन रहे हैं।

गृहस्थ जीवन, सबसे बड़ा धर्म
महामंडलेश्वर जी ने कहा कि हम सबके जीवन में भी सुरूचि और सुनीति का संशय बना रहता है। इसी कारण हम सब अपने लक्ष्य से विमुख हो जाते है। भगवान की भक्ति का मतलब यह नहीं है कि हम हिमालय पर चले जाएं या गृहस्थ जीवन की जिम्मेदारी से पलायन कर लें। भक्ति गृहस्थ होते हुए करना ज्यादा चुनौतीपूर्ण काम है।

गृहस्थ जीवन तो सबसे बड़ा धर्म माना गया है। प्रेम, दया, करूणा, सत्य जैसे गुणों का सृजन भक्तिमार्ग से ही संभव है। भारत भूमि को दुनिया में सर्वश्रेष्ठ स्थान इसीलिए मिला क्योंकि यह भक्तों की ही भूमि रही है। विडम्बना है कि हमें वृद्धावस्था में ही भक्ति का जुनून चढ़ता है। यदि भक्त प्रह्लाद और बालक ध्रुव की तरह बाल्यकाल से ही भक्ति के संस्कार मिलें, तो वृद्धावस्था संवर जाएगी। भक्ति में निष्काम भाव होना चाहिए। भक्ति में पाखंड या प्रदर्शन ज्यादा दिनों तक नहीं चल सकता।

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