उज्जैन। सिंहस्थ मेला क्षेत्र में प्रशासन की सख्त कार्रवाई से भूचाल आ गया । अवैध मठ-आश्रमों पर चली बुलडोजर कार्रवाई के बाद पूरे इलाके में अफरा-तफरी का माहौल है। अब बारी उन रसूखदारों की है, जिन्होंने ‘धार्मिक स्थल’ की आड़ में वर्षों से व्यावसायिक साम्राज्य खड़ा कर लिया था। प्रशासने ने छोटे लोगों पर तो कार्रवाई कर दी लेकिन क्या अब प्रशासन रसूखदारों का साम्राज्य उखाड़ पाएंगा।

धर्म की ओट में धंधा, अब टूट रहा सुरक्षा कवच
पिछले दो दशकों में सिंहस्थ क्षेत्र में मंदिर, मठ और आश्रम के नाम पर बड़े पैमाने पर होटल, मैरिज गार्डन और अन्य व्यावसायिक गतिविधियां पनपती जा रहीं है। सामने पूजा-पाठ, पीछे कारोबार—और यहीं अवैध निर्माण को ‘सुरक्षा कवच’बना रखा है। नगर निगम ने पुलिस-प्रशासन के साथ मिलकर नृसिंहघाट से लालपुल के बीच शंकराचार्य मठ स्वामी पुण्यानंदगिरि, श्री माधवानंद आश्रम सहित पांच प्रमुख स्थलों के अवैध हिस्से जमींदोज कर दिए।
180 अवैध निर्माण चिन्हित, 175 अभी भी निशाने पर
प्रशासनिक सर्वे में सिंहस्थ क्षेत्र में कुल 180 अवैध निर्माण पाए गए हैं। इनमें से कुछ पर कार्रवाई हो चुकी है, जबकि 175 स्ट्रक्चर अभी भी हटाए जाने बाकी हैं। सभी को स्वयं अतिक्रमण हटाने के नोटिस जारी कर दिए गए हैं।
प्रशासन का सख्या रवैया
कलेक्टर कार्यालय के सूत्रों के मुताबिक विगत दिनों हुई कार्रवाई मात्र ट्रेलर है। अब भी राजनीतिक और सामाजिक दबावों की तमाम कोशिशों के बावजूद प्रशासन पीछे हटने के मूड में नहीं है। अधिकारियों का कहना है कि सिंहस्थ मेला क्षेत्र की पवित्रता, सुरक्षा और व्यवस्था के लिए जमीन को खाली कराना अनिवार्य है—चाहे इसके लिए बल प्रयोग ही क्यों न करना पड़े।
अतिक्रमण रहे तो अव्यवस्था तय
यदि प्रशासन ने इन ‘स्थायी’अतिक्रमणों को नहीं हटाया गया, तो सिंहस्थ-2028 में हालात बेकाबू हो सकते हैं। इस वर्ष सिहंस्थ 2028 और व्यापक स्तर पर होगा। देश-विदेश के लोग यहां आएंगे ऐसे में यहां पर यदि अतिक्रमण रहा तो व्यवस्थाएं करने में कमी रहने की संभावना है
15 करोड़ से अधिक श्रद्दालू आने का अनुमान
1980 में मेला क्षेत्र 612 हेक्टेयर था, जो 2016 में 3061 हेक्टेयर तक पहुंच गया। इस बार इससे भी अधिक भूमि की जरूरत होगी। 2016 में जहां करीब 7 करोड़ श्रद्धालु आए थे, यहीं 2028 में लगभग 15 करोड़ श्रद्दालूओं के आने का अनुमान लगाया जा रहा है। ऐसे में अधिक जमीन की आवश्यकता होगी।
अतिक्रमण ना पड़ जाएं भारी
सिहस्थ में अखाड़ों और खालसों के पंडाल, भीड़ नियंत्रण के लिए होल्डिंग एरिया, आपातकालीन निकासी मार्ग, अस्थायी अस्पताल, पुलिस चौकियां, बिजली ग्रिड और विशाल पार्किंग इन सबके लिए खुली जमीन जीवन रेखा है। अतिक्रमण रहे तो जनहानि का खतरा बढ़ना तय है। यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब पक्का निर्माण पूरी तरह प्रतिबंधित था।
तब ये सैकड़ों अवैध संरचनाएं कैसे खड़ी हो गईं? यहां पक्का निर्माण के समय जिम्मेदार विभागों की चुप्पी साध रखी थी तो उन जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई कब होगी। नियमों के अनुसार अवैध निर्माण हटाने का पूरा खर्च—मशीनरी, लेबर, डीजल—अतिक्रमणकारी से वसूला जाना चाहिए, लेकिन अब तक ऐसी वसूली के ठोस रिकॉर्ड नहीं हैं। इसका बोझ सीधे सरकारी खजाने और जनता पर पड़ता है।
अब निर्णायक मोड़ पर प्रशासन
सिंहस्थ भूमि का संरक्षण अब सिर्फ प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि उज्जैन के सुरक्षित भविष्य की शर्त बन चुका है। सवाल बस इतना है कि क्या बुलडोजर रसूख से आगे निकल पाएगा, या दबाव के आगे फिर थम जाएगा?


