भागवत ग्रन्थ नहीं, जीवन को श्रेष्ठ अलंकरणों रुपी संस्कारों से
सजाने और संवारने का खजाना : जगदगुरु चैतन्य महाराज
मारवाड़ी माहेश्वरी प्रगति मंडल द्वारा गीता भवन में आयोजित भागवत ज्ञान यज्ञ में प्रेरक आशीर्वचन
इंदौर। कलियुग में भागवत कथा को भक्ति का सबसे सहज और सरल माध्यम माना गया है। धर्म वही है, जिससे भगवान की भक्ति प्राप्त हो। भागवत केवल ग्रंथ नहीं, अपने जीवन को श्रेष्ठ अलंकरणों रूपी संस्कारों से सजाने और संवारने का खजाना है। भगवान और भक्ति की प्राप्ति के तीन साधन बताए गए हैं। इनमें श्रवण, कीर्तन और नाम स्मरण प्रमुख हैं। इन तीनों साधनों में कोई धन खर्च नहीं होता। हमारी भक्ति भगवान के साथ छल करने जैसी है। हम जैसा बोएंगे, वैसा ही फल मिलता है।
ये दिव्य और प्रेरक विचार हैं वृन्दावन के जगदगुरु श्री गोपेश्वर चैतन्य महाराज के, जो उन्होंने सोमवार को मनोरमागंज स्थित गीता भवन पर पर माहेश्वरी समाज की अग्रणी संस्था मारवाड़ी माहेश्वरी प्रगति मंडल की मेजबानी में चल रहे भागवत ज्ञान यज्ञ में शिव-पार्वती विवाह, शुकदेव एवं परीक्षित जन्म तथा सती चरित्र प्रसंगों की व्याख्या करते हुए व्यक्त किए। कथा में शिव पार्वती विवाह का उत्सव भी पूरे उत्साह से मनाया गया। कथा शुभारंभ के पूर्व मंडल के अध्यक्ष रामकिशोर राठी, बजरंगलाल मालानी, कपिल लाहोटी, मनोज धूत, गौरीशंकर लोहिया, श्रीकांत गिलडा, गिरिराज बंग, रामवल्लभ भूतड़ा, रामप्रसाद चांडक, श्याम सुंदर कोठारी, रामदेव बलदेवा आदि ने सपत्नीक व्यास पीठ का पूजन किया। विद्वान वक्ता की अगवानी यजमान समूह के रामविलास राठी, राधेश्याम मालानी, रामप्रसाद जखेटिया, रामअवतार पलोड़, सुरेश नुहाल, सुनील मूंदड़ा आदि ने की। कथा में हरिनाम संकीर्तन की धूम पहले दिन से ही मची हुई है। अध्यक्ष रामकिशोर राठी ने बताया कि गीता भवन में जगदगुरु श्री गोपेश्वर चैतन्य महाराज के श्रीमुख से 13 जून तक प्रतिदिन दोपहर 3 से शाम 7 बजे तक भागवत कथामृत की वर्षा होगी। कथा में 9 जून को ध्रुव चरित्र, प्रहलाद चरित्र एवं वामन अवतार, 10 को श्रीराम एवं कृष्ण जन्म, 11 को बाल लीला, गोवर्धन पूजा एवं 56 भोग, 12 को महारास एवं रुक्मणी विवाह, 13 को सुदामा चरित्र एवं व्यास पूजा तथा रविवार 14 जून को सुबह 9 बजे पूर्णाहुति, यज्ञ एवं पूजन के साथ कथा का विराम होगा। कथा के दौरान विभिन्न प्रसंगानुसार उत्सव भी मनाए जाएँगे, जिनकी व्यापक तैयारियों भी की गई है।
जगदगुरु चैतन्य महाराज ने विभिन्न प्रसंगों के दौरान कहा कि कथा श्रवण के बाद यदि हम अपने कर्मो में थोड़ा सा भी सुधार कर सकें तो हमारा श्रवण सार्थक हो जाएगा। शिव और पार्वती श्रद्धा और विश्वास के प्रतीक हैं। भगवान के यहां भी हम जैसा अर्पित करेंगे, वैसा ही हमें वापस मिलेगा। यह नही समझें कि कोई हमें देख नहीं रहा है। सूर्य, चंद्रमा, तारे और नक्षत्र हमारे कर्मों पर निगरानी रखते हैं, इसलिए अपने कर्मों, खासकर भक्ति में पवित्रता और श्रेष्ठता का भाव रखना चाहिए। इनके बिना भक्ति का सृजन संभव नहीं हैं। भागवत यही संदेश देने वाला ग्रंथ है। मंगलवार को कथा में ध्रुव चरित्र, प्रहलाद चरित्र एवं वामन अवतार के प्रसंग होंगे।


