Narmada

कितने प्रकार की होती है नर्मदा परिक्रमा?  आइए जानते है नर्मदा परिक्रमा का महत्व

नर्मदा परिक्रमा वैसे तो हर वर्ष देवउठनी एकादशी से शुरू होती है। जिसे पहले तो साधु संत ही किया करते थे। लेकिन वर्तमान में नर्मदा परिक्रमा एक एडवेंचर में भी शामिल हो गई है। कई लोग अब नर्मदा परिक्रमा सिर्फ आध्यात्मिक रुप से ही नहीं बल्कि मां नर्मदा के तट पर स्थित कई तीर्थस्थलों के दर्शन करने के लिए भी करते है। प्राचिन समय में नर्मदा के किनारे करोड़ों तीर्थस्थल होने का वर्णन मिलता है लेकिन वर्तमान में इन तीर्थ स्थलों की संख्या गिनती में हो गई है। वर्तमान में भी नर्मदा का वैभव कम करने में सरकार के कदम भी लगातार बढ़ रहे है। इसमें आइए जानते है नर्मदा परिक्रम के चार प्रकार के बारे में

4 प्रकार से की जाती है नर्मदा परिक्रमा

मुंडमाल परिक्रमा (पहली परिक्रमा)
नर्मदा परिक्रमा में जो सबसे ज्यादा प्रचलित है वो है मुंडमाल परिक्रमा. इसमें किसी एक घाट से पर्टिकुलर एक स्थान से हम यात्रा शुरू करते हैं. नर्मदा जी को बगैर क्रॉस किये आपको पूरा सर्कल करना होता है. इसमें दो टर्निंग पॉइंट आते हैं एक अमरकंटक और दूसरा समुद्र. इस बीच में नर्मदा जी की धारा को बीच में लांघना नहीं होता है.
“कई ऐसे वैदिक और सनातन संतों की परंपरा में ऐसा देखा गया है कि उन्हें शिव की प्राप्ति हुई है. शास्त्रों में भी यह कहा गया है कि नर्मदा के दर्शन मात्र से ही मुक्ति मिल जाती है. मां नर्मदा के दर्शन करना मतलब पूर्ण दर्शन माना जाता है. पहला महत्व तो यही है कि परिक्रमा से हम नर्मदा जी का पूरा दर्शन करते हैं।

जलहरी परिक्रमा (दूसरी परिक्रमा)
दूसरी परिक्रमा होती है जलहरी परिक्रमा. जलहरी परिक्रमा में 2 सर्कल होते हैं. इसे विशेषकर अमरकंटक से शुरू करते हैं. जितने भी लोग जलहरी परिक्रमा की शुरूआत करते हैं, अमरकंटक से ही करते हैं. इसमें पहले दक्षिण तट की ओर जाते हैं. अमरकंटक से सीधे दक्षिण की ओर जाएंगे. विमलेश्वर तक समुद्र के किनारे तक जाएंगे फिर इसमें समुद्र क्रॉस नहीं करेंगे. वहां से फिर वापस अमरकंटक लौट कर आएंगे. फिर वापस अमरकंटक से उत्तर के रास्ते से समुद्र तक जाएंगे और फिर वापस मीठी तलाई से होते हुए अमरकंटक लौट कर आएंगे. इसमें समुद्र क्रॉस नहीं करेंगे. इस तरह से 2 बार सर्कल हो जाता है. इसे जलहरी परिक्रमा कहा जाता है।

हनुमंत परिक्रमा (तीसरी परिक्रमा)
तीसरी परिक्रमा है हनुमंत परिक्रमा. इस परिक्रमा को जब हम किसी भी तट से शुरू करते हैं, तो इसमें जहां पर भी हनुमानजी का मंदिर मिलता है वहां हम भगवान हनुमान को प्रणाम करते हैं. उनका पूजन करते हैं, उसके बाद हम वहां से तट परिवर्तन भी कर सकते हैं. उत्तर तट से दक्षिण तक भी जा सकते हैं. दक्षिण तट से उत्तर तक भी आ सकते हैं. ऐसा हम जहां हनुमान मंदिर मिलेंगे वहां ऐसा कर सकते हैं. ये हनुमंत परिक्रमा कहलाती है. इसे भी कई लोग करते हैं।
 
खंड परिक्रमा (चौथी परिक्रमा)
चौथी परिक्रमा खंड परिक्रमा है. आज के इस व्यस्ततम जीवन में कई लोगों को समय नहीं मिलता है. ऐसे में अगर आप खंड परिक्रमा करना चाहते हैं तो जब भी आपको छुट्टी मिले 5 दिन, 10 दिन के लिए तो आप कुछ दूरी तक की यात्रा कर लें फिर उसके बाद अपने काम पर लौट जाए. फिर जब आपको कभी छुट्टी मिले तो फिर आप कुछ दिन की यात्रा जहां से पहले यात्रा छोड़ी थी वहां से शुरू कर सकते हैं. इस तरह से कई वर्षों में इस परिक्रमा को पूरी की जाती है, इसलिए इसे खंड परिक्रमा बोलते हैं।

 

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