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बुनकरों की मेहनत सीधे खरीदारों तक… ‘फाइबर टू सिल्क फैब’ प्रदर्शनी का आयोजन गांधी हॉल में

बुनकरों की मेहनत सीधे खरीदारों तक… ‘फाइबर टू सिल्क फैब’ प्रदर्शनी का आयोजन गांधी हॉल में

10 जुलाई तक होगा प्रदर्शनी का आयोजन, बुनकरों के काम की मांग बढ़ी

– गोल्ड कोटिंग से बनी साड़ी ढाई लाख रूपये की उपलब्ध है

इंदौर।पारंपरिक सिल्क डिजाइन ने अब उन युवाओं को भी अपनी ओर आकर्षित किया है, जो कभी इन पारंपरिक पहनावों से दूरी बनाकर चलते थे। युवा पीढ़ी के बीच इन दिनों बुनकरों/हस्तकरघा उत्पादों की मांग बढ़ी है। सबसे खास बात कई बुनकर अब युवाओं को पारंपरिक पहनावे पर उनकी पसंद के डिजाइन उतारकर दे रहे हैं, तो कई युवा इसे अब गर्व के साथ अपनी परम्परा के लिए अपना रहे हैं।

 

इस बदलाव की कहानी इस शहर की उस प्रदर्शनी में नजर आ रही है, जो गांधी हॉल में ‘फाइबर टू सिल्क फैब’ नाम से आयोजित हुई है। प्रदर्शनी में बुनकरों की कहानियां गांव के करघों से निकलकर शहर तक पहुंच रही है। देशभर के सिल्क बुनकर अपनी कला और परंपरा को सीधे शहरवासियों के सामने प्रस्तुत कर रहे हैं। आयोजक आशीष गुप्ता ने बताया कि ‘फाइबर टू सिल्क फैब’ में 45 स्टॉल पर देशभर के बुनकरों का काम लेकर आए हैं। 10 जुलाई तक यहां उत्तर प्रदेश की बनारसी सिल्क साड़ी, जामदानी साड़ी, जामावर साड़ी, मलबरी सिल्क साड़ी, बिहार की ऑर्गेनिक टसर सिल्क साड़ी, भागलपुर सूट, दुपट्टा, ड्रेस सामग्री, तमिलनाडु की कांजीवरम सिल्क साड़ियाँ, डिज़ाइनर साडियाँ और सूट, आंध्र प्रदेश की पोचमपल्ली, उप्पादा, गडवाल साड़ी, पश्चिम बंगाल की बलचारी, ढाका मलमल बुटीक, कांथा साड़ी, गुजरात की पाटन पटोला, शुद्ध पैठानी सिल्क साड़ी, कोसा सिल्क साड़ी, शादी के लिए डिज़ाइनर साड़ियों का कलेक्शन मौजूद है।

 

गोल्ड कोटिंग से बनी साड़ी ढाई लाख रूपये की उपलब्ध है।

प्रदर्शनी में गुजरात के कच्छ क्षेत्र में तैयार की जाने वाली पारंपरिक घरचोला साड़ी भी आई है, जो अपनी अनूठी विशेषताओं के लिए जानी जाती है। मलबरी सिल्क से बनी इस साड़ी की खासियत यह है कि इसे तीन बार तक रंगा जा सकता है। पारंपरिक रूप से शादी में पहने जाने के बाद यह साड़ी बाद में दो बार और अन्य अलग-अलग रंगों में रंगकर नए रूप में सामने आती है, जो इसे बेहद खास बनाता है। इस साड़ी को तैयार करने में अत्यधिक मेहनत और समय लगता है। दो कुशल कारीगर मिलकर लगभग डेढ़ से दो महीने में इसे हाथों से बुनकर तैयार करते हैं। प्रदर्शनी में इसे प्रदर्शित करने आए बुनकरों का कहना है कि कच्छ में इस पारंपरिक कला को जीवित रखने वाले अब केवल तीन से चार परिवार ही शेष बचे है, जबकि इसकी मांग बहुत है। इसके अलावा प्रदर्शनी में प्रदर्शित हर साड़ी और कपड़े के पीछे कई दिनों की मेहनत और कारीगरी की बारीकी छिपी है। इस बार राजस्थान की खासियत भी शामिल है। स्टॉल पर हैंड ब्लॉक से कॉटन पर तैयार बेडशीट, बेड कवर, कंफर्टर, दोहर और बाथरोब मौजूद है, तो आंध्र प्रदेश की कलमकारी लेकर भी बुनकर आए हैं। इस काम को बुनकर मूंगा टसर, बेंगलुरु सिल्क, वाटर क्रेप सिल्क पर तैयार करते हैं। कपड़ा बनने से लेकर कपड़े पर पेंटिंग करने तक बुनकर अपनी परंपरा का ध्यान रखते हैं। आज भी कलमकारी नेचुरल फूलों और सब्जियों के रंग से तैयार की जाती है। एक दुपट्टे या एक साड़ी पर 7 से 10 कारीगर एक साथ कम से कम पांच और अधिकतम 12 दिन तक काम करते हैं। बनारसी सिल्क, मणिपुरी सिल्क, राजस्थान का पिछवाई और बिहार का मधुबनी भी इस प्रदर्शनी में महिलाओं की पसंद बना हुआ है।

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