राजस्थान, राजसंमंद जिले में कुंभलगढ़ के निकट ही स्थित है सुरजकुंड एक दैविक प्राकृतिक स्थल जहां पहुंचना तो आमजन के लिए आसान नहीं है लेकिन इस स्थल तक पहुंचने के बाद व्यक्ति का जीवन बदल जाता है । ऐसा राजसमंद जिले के कई भक्तों का कहना है। जब हम इस स्थल के महत्व की बात करते है तो ऐसा बताया जाता है कि यहां पर दिव्य संत श्री अवधेश चैतन्य ब्रह्मचारी जी महाराज रहते है। जिनकी प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैली है।

जिन्हें भक्त दाता के नाम से भी संबोधित करते है। दाता मतलब जो हमें देते है। संतश्री से साक्षात मिलने का अनुभव सैकड़ो भक्तों को चातुर्मास में ही मिल पाता है क्योकि सुरजकुंड तक पहुंचने के लिए लगभग तीन किलोमीटर तक पैदल चलना पड़ता है जो हर भक्त के लिए संभव नहीं होता है। तो आइए हम जानते है सुरजकुंड तक कैसे पहुंचा जा सकता है। इसके साथ ही हम कोशीश करेंगे कि हम संतश्री अवधेश चैतन्य ब्रह्मचारी महाराज से जुड़ी आध्यात्मिक यात्रा को कर पाए।
दंडी स्वामी है दिव्य श्री अवधेशानंद जी महाराज
राजस्थान के राजसमंद जिले में सूरजकुंड आश्रम के महंत हैं। जिन्होने सुरजकुंड में पिछले 25 से तपस्या करके सुरजकुंड को तपोस्थली के रूप में देदीप्यमान किया है। उनके जीवन को लेकर दिए गए उपदेश भौतिकता और आध्यात्मिकता के बीच सेतु बनकर हमें अपनी अंतरात्मा में छिपी शक्तियों को पहचानने और धर्म, प्रेम एवं शाश्वत शांति के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं। ओंकारेश्वर चातुर्मास के दौरान दंडी स्वामी साधु संतो के आगमन हुआ था। संतश्री भी दंड अपने साथ रखते है।
जल कलश का है रहस्य
दिव्य संत श्री अवधेश चैतन्य ब्रह्मचारी जी महाराज को जब भी देखा जाता है उनके हाथो में अधिकत्तर एक जल से भरा कलश होता है। जल कलश उनके साथ हमेशा चलता है। जिसे वह भक्तों को आर्शीवाद देते समय जल को छिंड़कते भी है। वह जल्द दिव्य माना जाता है। जल कलश रखने का क्या महत्व है यह तो अभी तक भी कई भक्तों को समझ नहीं आया है। चुंकि संतश्री ने भी इसकों लेकर अब तक कोई जानकारी भक्तों को नहीं दी है। यह संतश्री के रहस्यों में से एक है।
ओंकारेश्वर में चार्तुमास के बाद शुरू की पैदल नर्मदा परिक्रमा
सूरजकुंड के महाराज अवधेशानंद जी का दिव्य चातुर्मास 2025 ओंकारेश्वर में पूर्ण हुआ। इसके साथ ही संतश्री ने पैदल नर्मदा परिक्रमा का आगाज किया है। संतश्री की इस नर्मदा परिक्रमा के साथ ही संतश्री अवधेशानंद जी महाराज के भक्तों की संख्या मध्यप्रदेश भी लाखों में पहुंचने वाली है। चार्तुमास के दौरान लाखों की संख्या में भक्तो ने राजस्थान से पहुंच कर संतश्री के दर्शन किए थे।

इतने वर्षों में संतश्री ने कोई प्रचार-प्रसार में कोई रूचि नहीं दिखाई है। संतश्री सुरजकुंड कैसे आए। कैसे संतजीवन का आरंभ हुआ इसकी कोई अधिकारिक पुष्टी नहीं है लेकिन जो दिखा वहीं लिखा जा रहा है। सुरजकुंड एक दिव्य स्थल है। यह तपोभूमि है पुराने कुछ लोगों का कहना है कि पहले भी संत यहां पर तपस्या करते थे। लेकिन वहां तक पहुंचने वाले भक्तों ने सुरजकुंड के पानी को भी चमत्कारिक बताते हुए कई बीमारियों को खत्म करने वाला बताया गया है। खैर शारीरिक बीमारियों का तो पता नहीं लेकिन सुरजकुंड एक दैवीय स्थल अवश्य है जहां जाने के बाद भक्त आत्मिक शांति गुरू का आर्शीवाद और कई परेशानियों से मुक्ति अवश्य पाते है।
सुरजकुंड पहुंचने के है दो रास्ते
एक हम केलवाड़ा के पास से गवार नामक गांव से जा सकते हैं वहां से आपको पैदल चलकर जाना पड़ेगा और इसके लिए आपको रास्ते में सूरजकुंड जाने के निशान मिलेंगे । दूसरा रास्ता चारभुजा के थुरावड गांव से हो कर जाता है। यह रास्ता भी पगडंडी के सहारे चल के जाना पड़ता है । यहां का सफर बहुत ही शानदार है यहां बीच-बीच में पहाड़ है। यह यात्रा आपको एक साहसिक यात्रा का अनुभव भी कराती है।


