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प्रभु श्रीराम के वन गमन प्रसंग ने ही उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम बनाया – पं. राहुल
विमानतल मार्ग स्थित श्रीविद्याधाम में आद्य गौड़ ब्राह्मण सेवा न्यास के मातृशक्ति प्रकोष्ठ की मेजबानी में राम कथा जारी – आज भरत मिलाप
इंदौर जीवन में एक विचार भी हमारी दिशा और दृष्टि बदल सकता है, जरूरत है श्रद्धा और विश्वास की। ज्ञान की गहराई असीमित होती है। ज्ञान को मापने का कोई थर्मामीटर नहीं होता। हम भौतिक प्रगति पर तो सारा धन खर्च कर रहे हैं लेकिन आध्यात्मिक प्रगति में लगातार पिछडे हो रहे हैं। प्रभु श्रीराम ने अपने वनवास काल में समाज के अंतिम छोर के लोगों को गले लगाया और उनके बीच रहकर जीवन मूल्यों को समझा। यह कहना गलत नहीं होगा कि प्रभु श्रीराम के वन गमन प्रसंग ने ही उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम बनाया।
आचार्य पं. राहुल कृष्ण शास्त्री ने शुक्रवार को विमानतल मार्ग स्थित श्री श्रीविद्याधाम पर आद्य गौड़ ब्राह्मण सेवा न्यास के मातृशक्ति प्रकोष्ठ की मेजबानी में चल रही श्रीराम कथा में वन गमन प्रसंग की व्याख्या के दौरान उक्त दिव्य विचार व्यक्त किए। कथा में आज भी मनोहारी भजनों पर भक्तों के नाचने-गाने का सिलसिला चलता रहा। न्यास के अध्यक्ष पं. दिनेश शर्मा ने बताया कि कथा शुभारंभ के पहले राष्ट्र कवि पं. सत्यनारायण सत्तन, परशुराम महासभा के पं. गोविन्द शर्मा, पुष्कर लाल व्यास, अशोक चतुर्वेदी, दीपू मिश्रा, सुनील दीक्षित, सुरेन्द्र त्रिवेदी एवं दिनेश तिवारी ने व्यास पीठ का पूजन किया। विद्वान वक्ता की अगवानी राजकिशोर शर्मा, अजय व्यास, नंदकिशोर शर्मा, कोमल दीक्षित, विष्णु व्यास, लक्ष्मण माहेश्वरी, लोकेश शर्मा, राजेंद्र महाजन, विकास अवस्थी ने की। प्रकोष्ठ की भारती शर्मा एवं पिंकी शर्मा ने बताया कि विद्याधाम परिसर में श्रीराम कथा का यह दिव्य आयोजन 7 जून तक प्रतिदिन शाम 3.30 से 7.30 बजे तक चलेगा। कथा में शनिवार 6 जून को भरत मिलाप एवं रविवार 7 जून को राम राज्याभिषेक प्रसंग मनाए जाएँगे।
आचार्य पं. राहुल कृष्ण शास्त्री ने कहा कि आज हमारी युवा पीढ़ी चरित्र के मामले में भटक रही है। चरित्र ही मनुष्य की सबसे बड़ी पूँजी होता है। नैतिक मूल्यों और संस्कृति से विमुखता के कारण समाज में अनेक विकृतियाँ आ रही हैं। कलियुग में यह सब हो रहा है लेकिन विश्वास रखें कि मानस, गीता और भागवत जैसे धर्म ग्रन्थ यदि हमारी नई पीढ़ी के अंतर्मन में उतर जाएँगे तो देश का गौरव फिर से लौट सकता है। प्रभु श्रीराम ने अपने माता-पिता की आज्ञा का पालन करने में एक क्षण की देर भी नहीं लगाई। राज्याभिषेक को ठुकराकर वनवास की आज्ञा का पालन करने वाले आज के युग में कितने बेटे हो सकते हैं। राम कथा इसीलिए अद्भुत और अनुपम है कि इसके सभी पात्र हमारे परिवार और समाज को आदर्श बनाने की प्रेरणा देने वाले हैं।

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