भारतीय सनातन संस्कृति विश्व की सबसे श्रेष्ठ और उजली संस्कृति – पं. मुखिया
दशा नीमा समाज द्वारा मालगंज धर्मशाला पर आयोजित भागवत ज्ञान यज्ञ में मनाया गया रुक्मणी विवाह – आज पूर्णाहुति
इंदौर,। भारतीय सनातन संस्कृति विश्व की सर्वश्रेष्ठ और उजली संस्कृति है, जहाँ जन्म से लेकर मृत्यु तक सौलह संस्कारों का संग हमारे साथ जुदा रहता है। विवाह भी उनमें से एक है। हम विवाह को सौदा या अनुबंध नहीं, संस्कार मानते हैं जबकि पश्चिम के देशों में विवाह अनुबंध के आधार पर होते हैं। हमारे यहाँ विवाह का बंधन सात जन्मों के लिए और पश्चिम में कोई गारंटी नहीं कि चल जाए तो सात माह, सात दिन या सात घंटे। रुक्मणी का विवाह उनके मंगल का प्रतीक है। हमारे लिए गौरव की बात है कि अनेक विदेशी जोड़े भी अब तक सनातन संस्कृति में रहकर भारत भूमि पर विवाह करने आ रहे हैं।
ये प्रेरक विचार हैं प्रख्यात भागवतभूषण आचार्य पं. आदित्य मुखिया के, जो उन्होंने शुक्रवार को श्री दशा नीमा पंचायत ट्रस्ट द्वारा मालगंज चौराहा स्थित नवश्रृंगारित धर्मशाला भवन पर ट्रस्ट के हीरक जयंती महोत्सव एवं पुरुषोत्तम मास के उपलक्ष्य में चल रहे भागवत ज्ञान यज्ञ में रुक्मणी विवाह प्रसंग की व्याख्या के दौरान व्यक्त किए। कथा शुभारंभ के पहले व्यास पीठ का पूजन पूर्व विधायक गोपीकृष्ण नीमा, ट्रस्ट के मंत्री कमल नीमा, महेश नीमा गामा, सतीश नीमा, जौहरी अजय नीमा, शम्भू कुमार नीमा, अशोक नीमा आदि ने किया। विद्वान वक्ता की अगवानी राजेंद्र नीमा, अनिल एन नीमा, अजय नीमा अलंकार, अनिल के नीमा आदि ने की। संचालन जौहरी अजय नीमा ने किया। कथा में कृष्ण-रुक्मणी विवाह का उत्सव भी धूमधाम से मनाया गया। वर और वधू पक्ष के मेहमानों के बीच एकदूसरे की आवभगत, बधाई गीत और भजनों पर नाचने जैसे दृश्य भी देखने को मिले। दुल्हन रुक्मणी ने जैसे ही कृष्ण के गले में वरमाला डाली, समूचा कथा स्थल झूम उठा। पुष्प वर्षा भी हुई और भजन गायकों ने अपने भजनों से कथा पांडाल को थोड़ी देर के लिए ही सही, वृन्दावन में बदल दिया। भगवान के जयघोष के बीच भक्तों ने इस उत्सव का भरपूर आनंद लिया। अध्यक्ष सत्यनारायण नीमा एवं संयोजक सतीश नीमा मालक ने बताया कि शनिवार 6 जून को सुदामा चरित्र प्रसंग के साथ पूर्णाहुति होगी।
भागवताचार्य पं. मुखिया ने कहा कि आज का व्यक्ति डॉक्टर, वकील, नेता, अभिनेता तो बन गया है लेकिन मानव नहीं बन पाया है। जब तक हम मानव नहीं बनेंगे, राक्षसी शक्तियों का सामना नहीं कर पाएँगे। भगवान तो हम सबके मंगल के लिए ही अवतार लेते हैं लेकिन हम थोड़े से दुःख में ही विचलित होकर हर बुरी घटना का ठीकरा भगवान के मत्थे मढ़ते रहते हैं। हम इतने स्वार्थी हैं कि अच्छा हुआ तो हमने और बुरा हुआ तो भगवान ने कहने से नहीं चुकते। हमारी इसी मानसिकता को बदलने की जरूरत है। याद रखें कि जब सृष्टि में पत्ता भी भगवान की मर्जी से ही हिलता है तो अच्छे कामों का श्रेय लेने वाले हम कौन होते हैं। हम तो स्वयं को निमित्त मानें। हमारे संचित पुण्य कर्मों का प्रारब्ध ही हमें अच्छे या बुरे कर्मों में निमित्त बनाता है।


