जीव मात्र के प्रति करुणा, दया और स्नेह का मनोरथ ही हमें धर्म और नीति के रास्ते से पहुंचाएगा मोक्ष की मंजिल तक -आचार्य पं. आदित्य मुखिया
दशा नीमा समाज द्वारा आयोजित भागवत ज्ञान यज्ञ में धूमधाम से मना चुनरी मनोरथ और नौका विहार उत्सव
इंदौर। भक्ति और धर्म एकदूसरे के पर्याय एवं पूरक हैं। वही भक्ति और सेवा सार्थक होगी जिसमें सबके कल्याण और भलाई का भाव होगा। मन, वचन और कर्म से जीव मात्र के प्रति करुणा, दया और स्नेह का मनोरथ ही हमें धर्म और नीति के रास्ते से मोक्ष की मंजिल तक पहुंचा सकता है। कृष्ण और सुदामा की मित्रता पूरे विश्व के लिए अनुकरणीय है। कृष्ण जैसे राजा और सुदामा जैसे मित्र इस कलियुग में दुर्लभ ही है। आजकल सच्चे मित्र बहुत मुश्किल से मिलते हैं। भागवत कथा एक कान से सुनकर दूसरे से निकालने के लिए नहीं, अपने अंदर बैठाने के लिए है।
प्रख्यात भागवतभूषण आचार्य पं. आदित्य मुखिया ने शनिवार को श्री दशा नीमा पंचायत ट्रस्ट द्वारा मालगंज चौराहा स्थित नवश्रृंगारित धर्मशाला भवन पर ट्रस्ट के हीरक जयंती महोत्सव एवं पुरुषोत्तम मास के उपलक्ष्य में गत 31 मई से चल रहे भागवत ज्ञान यज्ञ में कृष्ण-सुदामा मैत्री प्रसंग की व्याख्या के दौरान उक्त दिव्य विचार व्यक्त किए। कथा में शनिवार को चुनरी महोत्सव का विशेष मनोरथ भी मनाया गया और नौका विहार के प्रसंग ने भी भक्तों को आनंदित बनाए रखा। चुनरी महोत्सव में यमुना जी को चुनरी चढ़ाई गई और एक विशेष कुंड बनाकर भगवान को नौका विहार कराने की जीवंत झांकी भी भक्तों में आकर्षण का केंद्र बनी रही। व्यास पीठ का पूजन दशा नीमा पंचायत के अध्यक्ष दिलीप नीमा, वल्लभ नीमा, विपिन नीमा, विजय कोटावाला, राजेश नीमा, आदि ने किया। आज कथा समापन अवसर पर भागवतभूषण आचार्य पं. मुखिया का ट्रस्ट की ओर से अध्यक्ष सत्यनारायण नीमा, संयोजक सतीश नीमा मालक, मंत्री कमल नीमा, वरिष्ठ ट्रस्टी महेश नीमा गामा, सतीश नीमा आदि ने शॉल-श्रीफल भेंट कर शहर के वैष्णव एवं नीमा समाज की ओर से अभिनन्दन किया। इसके पूर्व विद्वान वक्ता की अगवानी कमल नीमा, शम्भू कुमार नीमा एवं अजय नीमा अलंकार ने की।
सेठ और नीमा परिवार का सम्मान – ट्रस्ट के मंत्री कमल नीमा ने बताया कि समापन अवसर पर समाज में अनुकरणीय सेवा करने वाले नारायण सेठ एवं प्रह्लाद नीमा अलंकार को मरणोपरांत समाज की ओर से आचार्य पं. मुखिया के हाथों प्रशस्ति पत्र भेंटकर सम्मानित किया गया। दोनों परिवारों के सदस्यों ने यह सम्मान प्राप्त किया।
विद्वान वक्ता ने कहा कि सुदामा की भक्ति स्वार्थ की नहीं थी। वे कृष्ण के पास कुछ मांगने नहीं, मिलने गए थे। सुख-दुःख और उतार-चढ़ाव जीवन के क्रम हैं लेकिन अपने दृढ निश्चय से भटके बिना स्वाभिमानी सुदामा ने कृष्ण के प्रति श्रद्धा और विश्वास का रिश्ता बनाए रखा। भगवान ने सुदामा को दरिद्रता दी थी, जिसे कोई लेना नहीं चाहता। वर्तमान में दरिद्रता से बड़ा कोई अभिशाप नहीं है। हम अपने बच्चों का नाम तक सुदामा नहीं रखना चाहते। आजकल सच्चे मित्र वैसे भी बहुत मुश्किल से मिलते हैं। मित्रों के प्रति आत्मीयता और सम्मान का भाव होना चाहिए। कृष्ण और सुदामा की मैत्री राजा और प्रजा के मिलन की प्रतीक है। हमारे आधुनिक शासकों को भी इस मित्रता से प्रेरणा लेना चाहिए। भगवान जिसके मित्र हो वह कभी गरीब हो ही नहीं सकता। भागवत कथा मनुष्य को सत्य की राह पर प्रवृत्त कर उसकी कमियों से मुक्ति दिलाती है।


