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रामकथा संस्कारों का सृजन कर हमारे व्यक्तित्व को आदर्श बनाकर ऊंचाई की ओर ले जाती है – पं. राहुल कृष्ण

भारत भूमि की विलक्षण धरोहर है राम कथा – पं. राहुल कृष्ण
श्रीविद्याधाम में आद्य गौड़ ब्राह्मण सेवा न्यास के मातृशक्ति प्रकोष्ठ की मेजबानी में चल रही राम कथा में हुआ राज्याभिषेक – पं. शास्त्री का सम्मान

इंदौर,। रामकथा संस्कारों का सृजन कर हमारे व्यक्तित्व को आदर्श बनाकर ऊंचाई की ओर ले जाती है। रामकथा श्रवण के लिए मनोरंजन की आशा लेकर नहीं आना चाहिए। राम त्रिकाल सत्ता है। उनकी लीलाएं भी सर्वकालिक है। हनुमानजी सहित राम कथा के रघुकूल से जुड़े पात्रों के व्यक्तित्व के गुणों को शब्दों में समेट पाना असंभव है। रामकथा केवल शरीर से नहीं, मन, बुद्धि और चित्त से श्रवण करना चाहिए। रामकथा में जीवन की प्रत्येक चिंता, समस्या और संकट का समाधान मौजूद है। रामकथा भारतभूमि की विलक्षण धरोहर है जिसमें आसुरी संस्कृति के समूल विनाश और प्राणी मात्र के संपूर्ण मंगल के मंत्र भरे पड़े हैं। युगों-युगों से राम कथा की मन्दाकिनी हम सबका कल्याण और उद्धार करते आ रही है और आती रहेगी।
ये दिव्य और प्रेरक विचार हैं आचार्य पं. राहुल कृष्ण शास्त्री के, जो उन्होंने रविवार को विमानतल मार्ग स्थित श्री श्रीविद्याधाम पर आद्य गौड़ ब्राह्मण सेवा न्यास के मातृशक्ति प्रकोष्ठ की मेजबानी में चल रही श्रीराम कथा में राम राज्याभिषेक सहित विभिन्न प्रसंगों की व्याख्या के दौरान व्यक्त किए। न्यास के अध्यक्ष पं. दिनेश शर्मा ने बताया कि कथा शुभारंभ के पहले नगरीय प्रशासन मंत्री कैलाश विजयवर्गीय, विधायक रमेश मेंदोला, राष्ट्रकवि पं. सत्यनारायण सत्तन, राधेश्याम शर्मा गुरूजी, पं. हृदयेश दीक्षित, हरिनारायण यादव, एमआईसी सदस्य निरंजन सिंह चौहान गुड्डू, सुनील शर्मा, देवीप्रसाद शर्मा, अनमोल तिवारी, अंकित जोशी, योगेश होलानी, रवीन्द्र पांडे आदि ने व्यास पीठ का पूजन किया। विद्वान वक्ता की अगवानी श्रीमती पुष्पा शर्मा, भारती शर्मा, पिंकी शर्मा, पूर्णिमा शर्मा, सरस्वती शर्मा, साधना शर्मा, पूनम शर्मा, प्रीति शर्मा, हेमा शर्मा, शशि शर्मा, रंजना शर्मा आदि ने की। मातृशक्ति प्रकोष्ठ की ओर से आचार्य पं. राहुल कृष्ण शास्त्री का शॉल-श्रीफल एवं मालवी पगड़ी पहनाकर सम्मान भी किया गया।
आचार्य पं. शास्त्री ने कहा कि भगवान का कोई वर्ण या जाति नहीं है। वे सबको प्यारे हैं और बिना किसी भेदभाव के अपने भक्तों का उद्धार करते हैं। भगवान के अवतार श्रेष्ठ प्रयोजन के लिए होते हैं। रामचरित मानस लोकरंजन नहीं, लोकमंगल की कथा है। जिस तरह एक लोभी अपने धन को बढ़ाने के लिए जीवनभर आपा-धापी करता है, साधक को भी उसी तरह धर्म एवं अध्यात्म के प्रति अपनी श्रद्धा को बढ़ाने के लिए पुरूषार्थ करना चाहिए। श्रद्धा अखंड और अमिट होगी, तो ही हमारी क्रियाएं सार्थक होंगी। मानस भारतीय धर्म-संस्कृति का प्रामाणिक ग्रंथ है। राम नाम और कथा, दोनों ही अमृत हैं। यदि राम ने पिता के सत्य की रक्षा के लिए वनवास की आज्ञा नहीं मानी होती तो केवट को कौन गले लगाता, शबरी के जूठे बैर खाने कौन आतिथ्य स्वीकार करता, असुरों का नाश कौन करता और जंगल के भालू-वानरों को कौन दुलारता। राम का सम्पूर्ण व्यक्तित्व और चरित्र लांछन रहित है।

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