संस्कृति के संवर्धन के बिना कोई देश, समाज या परिवार समृद्ध नहीं हो सकता – स्वामी प्रणवानंद सरस्वती
गीता भवन में चल रहे भागवत ज्ञान यज्ञ में धूमधाम से मना रुक्मणी विवाह उत्सव – आज परीक्षित मोक्ष
इंदौर, । पेट की तरह आत्मा को भी भूख लगती है। भोजन से तो पेट की भूख मिट जाती है लेकिन आत्मा की भूख भजन, सत्संग और कथा श्रवण से ही मिटेगी। भारत संस्कारों की भूमि है। हम जन्म से लेकर मृत्यु तक संस्कारों और मर्यादाओं में बंधे हुए हैं। विवाह भी एक संस्कार है। पश्चिमी संस्कृति में विवाह अनुबंध या सौदा होता है, लेकिन भारत में यह सात जन्मों का रिश्ता माना जाता है। संस्कृति के संवर्धन के बिना कोई देश, समाज या परिवार समृद्ध नहीं हो सकता। विवाह जैसे संस्कार के कारण ही भारतीय समाज आज भी मर्यादित, संस्कारवान और आदर्शों से बंधा हुआ है।
ये प्रेरक विचार हैं वृन्दावन के आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी प्रणवानंद सरस्वती के, जो उन्होंने गीता भवन में भक्त मंडल एवं अखंड प्रणव योग वेदांत पारमार्थिक न्यास के तत्वावधान में चल रहे भागवत ज्ञान यज्ञ में रुक्मणी विवाह एवं सुदामा चरित्र प्रसंग की व्याख्या के दौरान व्यक्त किए। कथा में रुक्मणी विवाह का उत्सव पूरे जोश एवं उत्साह से मनाया गया। वर-वधू पक्ष ने एकदूसरे का स्वागत किया और जैसे ही भगवान कृष्ण ने रुक्मणी को वरमाला पहनाई, सत्संग सभागृह भगवान के जयघोष से गूंज उठा। प्रारम्भ में भक्त मंडल की ओर से बसंतीलाल गोयल, श्रीमती लीला राजेश अग्रवाल, श्रीमती रश्मि रामनानी, श्रीमती माधुरी मृदुला शाहरा, योगेश शुक्ल, कमल राठी, श्रीमती रामवती गुप्ता, राजेंद्र माहेश्वरी आदि ने व्यास पीठ का पूजन किया। विद्वान वक्ता की अगवानी मनोज गुप्ता, सुनील तिवारी, संतोष पाराशर, आनंद चौकसे आदि ने की। कथा में वृन्दावन से आए स्वामी कृष्णानंद, स्वामी भारतानंद सरस्वती, ब्रह्मानंद सरस्वती, ब्रजेशानंद सरस्वती, पूर्णानंद सरस्वती, स्वामी ज्ञानेश्वर, शिव चैतन्य, ब्रह्मचारी कन्हैया, ब्रह्मचारी योगेश, ब्रह्मचारी पंढरीनाथ सहित अनेक संत विद्वानों ने भी महामंडलेश्वरजी का स्वागत किया। बुधवार 22 जुलाई को परीक्षित मोक्ष सहित विभिन्न प्रसंगों की कथा होगी। गीता भवन में ज्ञान यज्ञ का यह आयोजन 23 जुलाई तक प्रतिदिन दोपहर 3.30 से शाम 6.30 बजे तक जारी रहेगा। गुरु पूर्णिमा महोत्सव 29 जुलाई को सुबह 10 से 12 बजे तक झलारिया स्थित स्वामी श्रीअखंड वेदांत आश्रम पर मनाया जाएगा।
स्वामी प्रणवानंद सरस्वती ने कहा कि भारतीय परिवार और समाज मर्यादा एवं संस्कृति की बुनियाद पर खड़ा है। भारत संतों, मुनियों और ऋषियों की भूमि है, जहां हर काम में मर्यादा का पालन होता है। निर्मल मन से की गई प्रत्येक क्रिया को यदि परमेश्वर को समर्पित कर दें, तो हमारा वही कर्म पूजा बन जाएगा। विवाह एक पवित्र बंधन है। पश्चिम में परिवार बनने के पहले ही टूटते और बिखर जाते हैं क्योंकि वहां संस्कारों का अभाव है। हमारी संस्कृति में विवाह सात जन्मों का बंधन है, सौदा या अनुबंध नहीं। हम विकृति नहीं, संस्कृति के पक्षधर हैं। भक्त मंडल की ओर से श्रीमती मृदुला शाहरा एवं श्रीमती कांता अग्रवाल ने बताया कि 23 जुलाई को सुबह हवन-पूजन के साथ कथा का समापन होगा।


