Narmada

जीवन को बदलने वाली मां नर्मदा परिक्रमा, खोल देती है ज्ञान के मार्ग

मां नर्मदा जो सांसरिक लोगों के लिए मात्र एक नदी हो सकती है लेकिन आध्यात्मिक मार्ग पर चलने वाले लोगों के लिए यह एक प्रेरणा है। यह एक ऐसी नदी है जो प्रेम,त्याग,प्रण और तपस्या के साथ जनकल्याण का संदेश देती है। यहीं मां नर्मदा इसका परिचय स्वयं के जीवन से देती है। जो स्वयं देवों के देव महादेव की पुत्री होने के बाद भी मैखल पर्वती की पुत्र के नाम से प्रसिद्ध हुई।

पुराणों में नर्मदा नदी की परिक्रमा का वर्णन मिलता है जिसके अनुसार, बताया गया है कि जो व्यक्ति अपने जीवन में एक बार नर्मदा परिक्रमा कर लेता है उसे जीवन के कई सारे ज्ञान एक साथ प्राप्त हो जाते हैं. इसके साथ ही उसके पापों का नाश हो जाता है व उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है. मान्यता है कि नर्मदा जी को दाहिनी ओर रखते हुए उनकी परिक्रमा की शुरुआत की जाती है. कई लोगों के अनुभव के अनुसार माना जाता है कि नर्मदा मैय्या की परिक्रमा कर लेने से लोगों की जिंदगी बदल जाती है. उन्हें आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति होती है।
जब मां नर्मदा यौवन अवस्था में आई तो नद सोनभ्रद के साथ उनका विवाह तय हुआ था। लेकिन जब मां नर्मदा को यह ज्ञात हुआ कि उनकी सहेली जोहिला को सोनभद्र से प्रेम हो गया था, तो उन्होने अपने प्रेम का त्याग करने का निर्णय लिया। यह निर्णय सिर्फ एक निर्णय नहीं बल्कि अपने गुस्से को उन्होने एक प्रण में बदल दिया और जिसके बाद नर्मदा ने आजीवन कुंवारी रहने का प्रण लिया।

जीवनदायी है मां नर्मदा
सहेली के धोखे से आहत थी कि उन्होने स्वयं वहां से उल्टी दिशा में चलना शुरू कर दिया। मां नर्मदा का वह दर्द और पीड़ा इतनी थी कि मां नर्मदा पश्चिम की ओर बहने लगी। एक दूरी तय करने के बाद मां नर्मदा शांत हो गई। वर्तमान में आज मां नर्मदा का जल और मां नर्मदा के तट कई शहरों को जीवन दे रहे है। मध्यप्रदेश में मां नर्मदा को जीवनदायी नदी कहा जाता है। इसके जल से ही पूरे प्रदेश के कई शहरों की प्यास बुझाती है।

भगवान शिव की पुत्री है मां नर्मदा
मां नर्मदा को भगवान शिव की पुत्री माना जाता है। जो भगवान शिव की तपस्या में पसीने की बुंद से प्रकट हुई थी। जिसकी उत्पत्ति ही तपस्या का फल हो वह सबसे पहले तो हर व्यक्ति हर साधु-संत को तपस्या का महत्व बताती है। इसके साथ ही मां नर्मदा का धरती पर आना और मेखल पर्वत की पुत्री के नाम से प्रसिद्ध होना। ऐसा वर्णन स्कंद पुराण में मिलता है।

ऐसे हुआ मां रेवा का जन्म
भगवान शिव के पसीने से मां नर्मदा का जन्म हुआ था। जिसके बारे में पुराणों में लिखा है कि भगवान शिव मैखल पर्वत पर तपस्या में लीन थे तब उनके पसीने की बूंदे गिरी थी। उससे मां नर्मदा का जन्म हुआ। मैखल पर्वत के शिखर पर उत्पन्न होने के चलते  मां नर्मदा को मैखल राज की पुत्री भी कहा जाता है। ऐसा भी मान्यता है कि मैखल पर्वत पर प्रकट होने के चलते देवताओं ने मां नर्मदा नाम रखा था। जिसके चलते उन्हें यह भी वरदान मिला कि उनके तट पर सभी देवी- देवताओं की पूजा का लाभ मिलेगा।
दर्शन मात्र से मिलता है पुण्य
मां नर्मदा का महत्व इतना है कि पूरी सष्टि की सभी नदियों में इनका स्थान सबसे ऊपर है। ऐसी मान्यता है कि गंगा में एक बार के, यमुना में तीन बार के, सरस्वती में 7 बार के स्नान से जो पुण्य मिलता है वह केवल मां नर्मदा के दर्शन मात्र से मिल जाता है। मां नर्मदा के दर्शन से मानसिक परेशानियां दूर होती है।

सामवेद के तुल्य है मां नर्मदा
भारत में चार नदियों को चार वेदों के रूप में माना गया है। जिसमें मां गंगा को ऋग्वेद, मां यमुना को यजुर्वेद, सरस्वती को अर्थर्ववेद और मां  नर्मदा को सामवेद माना जाता है। सामवेद कलाओं का प्रतीक है जो कि मां नर्मदा को भी माना जाता है।

13 नामों से जानी जाती है मां नर्मदा
मां नर्मदा को 13 नामों से जाना जाता है।  जिसमें शोण, महानदी, मंदाकिनी, महापुण्य प्रदा त्रिकुटा, चित्रोपला, विपाशा, बालवाहिनी, महार्णव विपाषा, रेवा, करभा, रूद्रभावा और नर्मदा जो हम सभी जानते है।  इसके अलावा पावन सलीला, मेकलसुता के साथ ही जगदानंदी भी कहा जाता है।

मां नर्मदा के किनारे साढे 3 करोड़ तीर्थ
भारत देश की नदियां प्रायः पश्चिम से पूर्व की ओर बहती है लेकिन  प्रकृति के नियमों के विरूद्ध मां नर्मदा अमरकंटक से ऊपर की ओर भरूच, भ्रण कच्छ के निचे खम्भात की खाड़ी में रत्ना सागर में गिरती है। नर्मदा की के दोनो तटों पर अमरकंटक से लगा कर भरूच तक साढ़े तीन करोड़ तीर्थ स्थल इसके किनारे पर है। ऐसा बताया जाता है कि नर्मदा की कुल लम्बाई में से 1112 किलोमीटर का क्षेत्र मध्यप्रदेश में आता है। नर्मदा जी की 1780 मील की परिक्रमा 3 वर्ष 3 माह 13 दिन में संत करते है। नर्मदे हर का स्मरण करते हुए पैदल चलते है। इसके साथ ही प्रतिदिन 5 गृहस्थों से भिक्षावृत्ति कर पूर्ण की जाती है।


मां नर्मदा के आंचल में श्री अवधेश चैतन्य ब्रह्मचारी जी महाराज
मां नर्मदा की तपस्य़ा और त्याग और जनकल्याण की कथाएं तो जगजाहिर है। मां का देवलोक में सबसे ऊंचा स्थान है। लेकिन पूरे विश्व में मां नर्मदा की परिक्रमा करने का ही महत्तव है।  संतों का मोक्ष की चाह में नर्मदा के तट पर तपस्या करने का जिक्र तो कई बार मिलता है लेकिन इस वर्ष 2025 से राजस्थान के सुरजकुंड धाम के श्री अवधेश चैतन्य ब्रह्मचारी जी महाराज की नर्मदा परिक्रमा कुछ अलग है जो मां के आंचल में एक पुत्र के पहुंचने जैसा प्रतित होता है।

श्री अवधेश चैतन्य ब्रह्मचारी जी महाराज ने सुरजकुंड जैसी तपोस्थली पर वर्षों तक तपस्या की है। अपनी तप की यात्रा में इस वर्ष उन्होने मां नर्मदा के तट पर अपना चातुर्मास पूर्ण करने के बाद पैदल मां नर्मदा की परिक्रमा शुरू की है। संत श्री नंगे पांव मां नर्मदा के तट पर चल रहे है। परिक्रमा के दौरान मां नर्मदा की आरती और पुजन करके मां नर्मदा का आर्शीवाद प्राप्त कर रहे है। सिद्धि प्राप्त करने की इच्छा ले कर तो यहां पर कई संत सन्यासी आते होंगे लेकिन ये विरले संत है जो अपने तप-सिद्धि को प्राप्त करने के बाद मां नर्मदा के आंचल में मां का सानिध्य पाने के लिए निकल पड़े है। संतश्री का मां नर्मदा की गोद में जाना तो दिखाई दे रहा है लेकिन संतश्री को मां नर्मदा का मिलने वाला नित्य स्नेह अदृश्य है जिसें देख पाना सांसारिक नेत्रों से तो संभव नहीं लेकिन इसकी अनुभूति पाने की लालसा लिए कई भक्त भी मां नर्मदा की परिक्रमा पर है।

सारे तीर्थ दर्शन करने मां नर्मदा के तट है आते

ऐसी भी मान्यता है कि वर्ष में एक बार सारे तीर्थ मां नर्मदा से मिलने आते है। मां गंगा सहित अन्य पवित्र नदियां भी मां नर्मदा से मिलने स्वयं आती है। ऐसी भी मान्यता है कि नर्मदा तट पर किए गए दाह संस्कार के बाद गंगा जी जाने की जरूरत नहीं होती है।

नर्मदा के तट पर त्यागते है प्राण
मां नर्मदा के तट पर सिद्धि प्राप्त होती है। देव,ऋषि, मुनि, मानव, सन्यासी सभी सिद्धि प्राप्त करने के लिए मां नर्मदा के तट पर आते है। यहां पर कई संत-सन्यासी नर्मदा के तट पर ही प्राण त्यागते है। जिससे उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है।

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