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भगवान कृष्ण के श्राप का प्रायश्चित करने के लिए आज तक अश्वत्थामा कर रहा है मां नर्मदा की परिक्रमा

अष्ट चिरंजीवियों में से एक हैं अश्वत्थामा। महाभारत के प्रमुख पात्रों में से एक अश्वत्थामा, ये कौरवों व पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र थे। हनुमानजी आदि आठ अमर लोगों में अश्वत्थामा का नाम भी आता है। अर्थात अश्वत्थामा, राजा बलि, व्यासजी, हनुमानजी, विभीषण, कृपाचार्य, परशुराम व ऋषि मार्कण्डेय इनके बारे में जनमानस ने कथा और कहानियों में सुना होगा। ये आठों अमर हैं। इनमें से अश्वत्थामा, ऋषि मार्कण्डेय जी नर्मदा परिक्रमा के दौरान संतो और नर्मदा भक्तों को दर्शन देते है। लेकिन कई भक्त इस बात का जिक्र नहीं करते या उन्हें पहचान ही नहीं पाते है। महाभारत के सबसे विवादास्पद और शक्तिशाली पात्रों में से एक, अश्वत्थामा, आज भी कलयुग में भटक रहा है। लेकिन उसे मिली यह अमरता कोई वरदान नहीं, बल्कि उसके द्वारा किए गए जघन्य अपराध का दंड है। वह आज तक नर्मदा के किनारे शुलपाणी के जंगलों में रहते है। इसका जिक्र कई मां नर्मदा के भक्तों ने किया है। मुझे स्वयं भी ओंकारेश्वर के एक संत ने उनके आने का जिक्र किया है।

अश्वत्थामा ने लिया था प्रतिशोध
महाभारत युद्ध समाप्त हो चुका था, लेकिन अश्वत्थामा के भीतर अपने पिता द्रोणाचार्य की मृत्यु का प्रतिशोध सुलग रहा था। एक रात उसने पांडवों के शिविर पर हमला कर दिया और सो रहे द्रौपदी के पांचों पुत्रों (पांडवों के उत्तराधिकारियों) की निर्मम हत्या कर दी। पांचों पुत्रों को खोने के बाद द्रौपदी का विलाप सुनकर अर्जुन ने प्रतिज्ञा ली कि वे अश्वत्थामा का सिर काटकर द्रौपदी के चरणों में अर्पित करेंगे। अर्जुन ने अश्वत्थामा को पराजित कर उसे बंदी बनाया द्रौपदी के सामने खड़ा कर दिया।

द्रोपद्री ने दिया जीवनदान
द्रौपदी ने कहा कि यह हमारे गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र हैं। जिस पुत्र-शोक की ज्वाला में मैं जल रही हूं, मैं नहीं चाहती कि अश्वत्थामा की माता गौतमी को भी वही दुःख सहना पड़े। एक मां के रूप में मैं दूसरी मां की कोख सूनी नहीं कर सकती।” भगवान श्रीकृष्ण मुस्कुरा उठे। उन्होंने इसे ‘क्रोध पर विवेक की विजय’  बताया।

मणि का त्याग और अमरता का श्राप
हालांकि द्रौपदी ने उसे प्राणदान दे दिया था, लेकिन अश्वत्थामा का अपराध क्षमा योग्य नहीं था। उसने अजन्मे शिशु (अभिमन्यु पुत्र परीक्षित) पर भी ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया था। तब भगवान श्रीकृष्ण ने न्याय करते हुए अश्वत्थामा को दंडित करने का निर्णय लिया। श्रीकृष्ण ने अश्वत्थामा के माथे पर जन्म से मौजूद ‘दैवीय मणि’  को निकाल लिया। वह मणि उसे हर भय और भूख-प्यास से बचाती थी। दूसरा श्रीकृष्ण ने उसे श्राप दिया कि वह कलयुग के अंत तक पृथ्वी पर भटकता रहेगा। उसके माथे का वह घाव कभी नहीं भरेगा और वह एकांत में, समाज से दूर, भयानक कष्टों के साथ जीवित रहेगा।

कलयुग में अश्वत्थामा की उपस्थिति
माना जाता है कि अश्वत्थामा आज भी जीवित है और अपने किए गए पापों का प्रायश्चित कर रहा है। कई लोककथाओं में दावा किया जाता है कि मध्य प्रदेश के असीरगढ़ किले और कुछ अन्य प्राचीन मंदिरों में आज भी एक रहस्यमयी व्यक्ति को माथे पर गहरा घाव लिए देखा जाता है।

एक संत ने किया अश्वत्थामा का जिक्र
एक योगी सच्चिदानंद ने अपने गुरू के अनुभव के साझा करते हुए फेसबुक पर लिखा है कि नर्मदा परिक्रमा के दौरान गुरुदेव ने महाभारत के अमर पात्र अश्वत्थामा जी के साथ करीब छःमाह साथ व्यतीत किया था। नर्मदा के किनारे – किनारे चलकर गुरुदेव सुल्पान की झाड़ियों में प्रवेश कर गये। जंगल के साथ भीलों का एक लंबा इतिहास जुड़ा हुआ है। बड़ा विकट जंगल था। भील प्रायः नर्मदा की परिक्रमा करने वाले महात्माओं को लूट लेते थे, उन्होंने गुरुदेव को पकड़ लिया और उनके पास की चिजों को छिन लिया और साथ चलने का इशारा किया। वे भील थे पर उनकी अपनी एक सभ्यता थी, उनकी अपनी व्यवस्था थी। अपने मुखिया की बातों को वे भगवान् की बात समझते थे। शिव उनके देवता थे। उन भीलों के साथ गुरुदेव ने काफी समय गुजारा। उन भीलों में प्रत्येक दिन एक विशेष व्यक्ति को देखते थे। जो प्रतिदिन आता था। उसकी आंखों में एक तेज था। भीलों की तरह वह रहता था पर कद काफी लम्बा था। सदैव पीत वस्त्र पहने रहता था। जब भी गुरुदेव ने कुछ पुछना चाहा तो वह उसके पहले ही उठ के चल देते थे।

सुल्पानेश्वर महादेव मंदिर पर रहने का जिक्र
एक दिन अचानक उसी व्यक्ति पर गुरुजी की नजर जाकर स्थिर हो गई। गुरुदेव सुल्पानेश्वर महादेव मंदिर पर विश्राम कर रहे थे। वह काफी लंबा जवान था। खड़ी-खड़ी मूंछें थी। बड़ी-बड़ी आंखें मानों अंगारे बरसा रही हों। वह भील दिव्य नजर आ रहा था। सौम्य और शांत था। स्वाभाव का स्थिर था। सिर पर पीले रंग की पगड़ी बांधे हुये था। गुरुदेव उनसे मिलने के लिए आगे गये। मंदिर की सीढ़ियों पर चढ़ते हुए उस विशाल भील पुरुष ने पीछे मुड़कर उन्हें लौट जाने का आग्रह किया। तब तक गुरु जी समीप पहुंच कर उनके पैर पकड़ लिए,  ” आप जो कोई भी हों मुझे आप का परिचय चाहिये। चाहे हम अधूरे है या चाहे हम पूरे दोनों हालात में हमें मार्गदर्शन कीजिए। आपका दिव्य शरीर और ऊंचा मस्तक कह रहा है कि आप आज के पुरुष नहीं है। “और उन्होने मुझे अपनी बाहों मे उठाकर चूम लिया। जैसे एक पिता अपने पुत्र को गोद में ले लेता है। भीलों का वह पुरुष सबसे सभ्य और पुज्य था। भील शिव के साथ उस महापुरुष की भी पूजा किया करते थे। महापुरुष ने कहा- वत्स! मैं अश्वत्थामा हूँ। आचार्य द्रोणाचार्य का पुत्र। महाभारत का एक योद्धा रह चुका हूँ। युद्ध का सेनापति अश्वत्थामा हूँ। इस सुल्पानेश्वर महादेव को ही अपना निवास बना रखा है और इन भीलों को अपना सहयोगी। कभी-कभी कृपाचार्य और विदुर से मिलने हिमालय चला जाता हूँ। आयु की दीर्धस्थ स्थिति में पहुँच कर और रह ही क्या जाता है। कृपाचार्य, विदुर के यदाकदा यहां आ जाने से सुल्पानेश्वर भी हिमालय बन जाता है। गोरखनाथ से भी कभी-कभी भेंट हो जाती है “।

अश्वत्थामा के ललाट पर एक लंबे चीरे का दाग
” मेरी सामर्थ्य, युद्ध – कौशल और दिव्य कलाएं मणि निकलने के बाद समाप्त हो गयी। मै रह गया। मेरा ऐश्वर्य, शौर्य और बल मुझसे अलग हो गया पर जो अमरता का वरदान मिला था, जिन योग परातत्वों से मैनें अमरता का वरदान प्राप्त कर लिया था उसे न पाण्डव ले सके, न कृष्ण। अश्वत्थामा के ललाट पर एक लंबे चीरे का दाग बना था जैसे किसी ने कभी ललाट को फाड़कर अलग किया हो। घाव मिट गया पर गड्ढा नहीं भरा था। गुरुदेव युगान्तर पुरुष अश्वत्थामा के साथ छः महीने तक रहे। कभी-कभी लंबे सफर में निकल जाते थे और आम लोगों की तरह टहलते रहते थे। कभी-कभी लंबे सफर पर निकल जाते थे शहरों में घुम आते थे। आज का विश्व न जाने कहाँ जाना चाहता है जो अपने आसपास घट रही घटनाओं पर घ्यान नहीं देता। एक दिन महापुरुष गुरुदेव के मस्तक को चूमकर और सिर पर हाथ रखकर लुप्त हो गया।

 

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