मां नर्मदा, जिसे भौतिक जगत में नदी कहा जाता है। लेकिन जब इसे आध्यत्मिक रूप से देखा जाता है तो मां नर्मदा जीवन को बदलने वाली आत्म शुद्दि
स्वरूपा दिखाई देती है। जो जीवन की यथार्थ से अवगत कराती है। नर्मदा परिक्रमा मात्र एक यात्रा नहीं बल्कि जीवन में हर सांसारिक व्यक्ति के द्वारा ढोए जा रहे एक माया मोह और अंहकार को दूर करने का सफर है जहां एक सांसरिक व्यक्ति यह अनुभूति करता है कि जीवन तो बिना सुविधाओं के मात्र चंद संसाधनो में भी बीताई जा सकती है। ऐसा क्या है जो हमें जीवन में प्राप्त करना है।
संतों संग नर्मदा परिक्रमा का अदभूत संयोग
नर्मदा परिक्रमा तो कई बार की जा सकती है लेकिन इस यात्रा के दौरान संतों का साथ मिल जाए तो इस यात्रा का पूण्य हजारों गुना बढ़ जाता है। इस वर्ष ओंकारेश्वर में चातुर्मास पूर्ण करने के बाद सुरजकुंड धाम राजस्थान के संत श्री अवधेश चैतन्य ब्रह्मचारी जी महाराज इस वर्ष मां नर्मदा की पैदल परक्रमा कर रहे है। यह अदभूत यात्रा है जब एक सिद्ध संत मां नर्मदा के आंचल में जहां का आर्शावाद प्राप्त कर रहे है। वहीं इनके साथ भक्त अपने आत्मज्ञान प्राप्त करने का प्रयास कर रहे है जिसमें भक्तो को गुरू का सानिध्य प्राप्त है।
संतों संग यात्रा में हमें सिर्फ आत्म शांति नहीं अपितु आत्मज्ञान की प्राप्ति हो जाती है। कई बार एक सांसरिक व्यक्तियों के मन में विचार अवश्य आते है कि जब नर्मदा परिक्रमा करने के दौरान वैराग्य की प्राप्ति होती है तो संत इस मार्ग पर क्यों निकल पड़ते है जबकि वह स्वयं तो वैराग्यधारी ही होते है। ऐसे ही अदभूत रोमांच और रहस्यों के साथ प्रतिवर्ष शुरू होती है नर्मदा परिक्रमा जिसकी अवधि अलग-अलग होती है।
आत्म-शुद्धि की है यात्रा
नर्मदा परिक्रमा भौतिकता से जीवन के यथार्थ की ओर ले जाने वाली एक आध्यात्मिक और आत्म-शुद्धि की यात्रा है, जिसमें नर्मदा नदी के तट के किनारे लगभग 1312-2600 किलोमीटर की पदयात्रा की जाती है। यह यात्रा व्यक्ति को अपने कर्मों के बंधन से मुक्त करती है और उसे आध्यात्मिक ज्ञान, तपस्या, और आत्मबोध प्रदान करती है।

नर्मदा यात्रा में अहंकार को त्यागना है आवश्यक
नर्मदा यात्रा में अहंकार को त्यागना अनिवार्य है, क्योंकि यह यात्रा आत्म-शुद्धि और मोक्ष के लिए एक आध्यात्मिक साधना है। नर्मदा परिक्रमा का रहस्य इसके आध्यात्मिक महत्व और तपस्या में निहित है, जो व्यक्ति को आत्म-ज्ञान, विनम्रता और वैराग्य सिखाती है।
मां नर्मदा के भरोसे जीना सीखाती ‘भिक्षा’
“भिक्षाम देही” नर्मदा परिक्रमा में आने वाला एक ऐसा पड़ाव है जो संतो के लिए आसान होता है। लेकिन संसार के माया मोह से दूर ना हुए किसी व्यक्ति के लिए अपने अहंकार को तोड़ने जैसा होता है जिसने अपने जीवन में कभी से कभी कुछ भी ना मांगने का भ्रम पाल रखा हो वह इस यात्रा में अपने अहंकार से मुक्त होने के लिए भिक्षा अवश्य मांगता है। भिक्षा मांगना इसमें इसलिए आवश्यक है क्योंकि यह एक साधक को इंद्रियों और अहंकार पर नियंत्रण रखना सिखाता है, सांसारिक मोह से दूर रहकर केवल नर्मदा माँ के भरोसे रहने का अभ्यास कराता है, और सादगी व स्वावलंबन को प्रोत्साहित करता है।
नर्मदा परिक्रमा का रहस्य
मां नर्मदा और नर्मदा परिक्रमा यह मन और आत्मा की शुद्धि का यात्रा है। ऐसा माना जाता है कि मां नर्मदा जन्म-जन्मांतर के पापों का नाश करती है। इसके साथ ही यह यात्रा सांसारिक जीवन से दूर मनुष्य को प्रकृति और स्वयं के साथ एकांत में समय बिताने का अवसर देती है, जिससे आत्म-ज्ञान प्राप्त होता है।
परिक्रमा एक कठोर तपस्या
परिक्रमा स्वयं में एक कठोर तपस्या है, जो पैदल चलने, खुले में सोने और भिक्षा पर निर्भर रहने जैसे नियमों के माध्यम से साधक को अनुशासन और सहनशीलता सिखाती है। भिक्षा मांगना अहंकार को तोड़ता है। जब साधक दूसरों से भोजन मांगता है, तो यह उसके अहंकार को कम करता है और उसे विनम्र बनाता है। यात्रा के दौरान वैराग्य की भावना व्यक्ति को सांसारिक वस्तुओं की आवश्यकता नहीं होने का भी आभास कराती है। वह केवल अपनी मूल आवश्यकताओं के लिए दूसरों पर निर्भर है, जिससे वैराग्य की भावना बढ़ती है।


