मां नर्मदा की परिक्रमा करने के दौरान कुछ नियमों का पालन करना अनिवार्य होता है। यदि मां नर्मदा की परिक्रमा के दौरान नियमों का पालन नहीं किया जाता है तो
narmada
नर्मदा तट के सौंदर्य का वर्णन कभी करते-करते इतिहासकार थक जाते थे। जो नर्मदा कभी शांत तो कभी रोद्र रूप दिखाती हुई अपनी सीमाओं में रहने के लिए प्रसिद्ध रही
नर्मदा परिक्रमा वैसे तो हर वर्ष देवउठनी एकादशी से शुरू होती है। जिसे पहले तो साधु संत ही किया करते थे। लेकिन वर्तमान में नर्मदा परिक्रमा एक एडवेंचर में भी
विश्व की एकमात्र नदी है मां नर्मदा जिसकी परिक्रमा की जाती है। लेकिन प्रश्न यह उठता है कि जब नदीं उल्टी दिशा में बहती है तो उल्टी दिशा में बहने
मां नर्मदा अपने प्रण को पूरा करने वाली नदी है। इसलिए साधु संत मां नर्मदा के किनारे तपस्या करते है जिससे उनका आध्यात्मिक प्रण पुरा होता है। मां नर्मदा ने
मां नर्मदा जो सांसरिक लोगों के लिए मात्र एक नदी हो सकती है लेकिन आध्यात्मिक मार्ग पर चलने वाले लोगों के लिए यह एक प्रेरणा है। यह एक ऐसी नदी
मां नर्मदा, जिसे भौतिक जगत में नदी कहा जाता है। लेकिन जब इसे आध्यत्मिक रूप से देखा जाता है तो मां नर्मदा जीवन को बदलने वाली आत्म शुद्दि स्वरूपा दिखाई
मां नर्मदा के आंचल में संत अवधेश चैतन्य महाराज ने 3000 हजार किलोमीटर की परिक्रमा का आगाज किया है। संत श्री ने ओंकारेश्वर में मां नर्मदा के निकट रह कर
भारत में एक ऐसी नदी है जिसका धार्मिक महत्व काफी बड़ा है. लोग इसकी परिक्रमा करते हैं. इस नदी का नाम नर्मदा है जो मध्य प्रदेश से निकलती है. ये










